1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jul 17, 2026, 8:13:21 AM
- फ़ोटो
पटना: बिहार के चर्चित आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय से पहले रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से की गई सख्त टिप्पणियों ने इस पूरे मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। अदालत ने सवाल उठाया कि ड्यूटी पर तैनात एक सरकारी अधिकारी की हत्या को आखिर "दुर्लभतम" मामलों की श्रेणी में क्यों नहीं माना गया।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि बिहार सरकार ने वर्ष 2023 में जेल नियमों में संशोधन कर आनंद मोहन समेत कई उम्रकैद के सजायाफ्ता कैदियों की समय पूर्व रिहाई का रास्ता साफ किया था। अब इस फैसले की वैधता पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मृतक आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया, बिहार सरकार, आनंद मोहन और राज्य सजा माफी बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों की दलीलें विस्तार से सुनीं।सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यदि ड्यूटी निभा रहे सरकारी कर्मचारी की हत्या को भी गंभीरतम अपराध नहीं माना जाएगा तो इससे गलत संदेश जाएगा। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी सोच अपराधियों का मनोबल बढ़ा सकती है और वे यह समझ सकते हैं कि सरकारी अधिकारियों पर हमला करने के बावजूद कानून से राहत मिल सकती है। हालांकि अदालत ने अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन इन टिप्पणियों को इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दरअसल, बिहार सरकार ने अप्रैल 2023 में जेल नियमावली में संशोधन किया था। पहले ऐसे दोषियों को समय से पहले रिहा नहीं किया जा सकता था, जिन्हें ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया हो।सरकार ने इस प्रावधान को हटाने के बाद आनंद मोहन की रिहाई का आदेश जारी किया। इसके बाद 27 अप्रैल 2023 को उन्हें सहरसा मंडल कारा से रिहा कर दिया गया। इस फैसले का जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया और उनकी बेटी ने विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि सरकार ने नियम बदलकर एक दोषी को अनुचित लाभ पहुंचाया है।
जी. कृष्णैया हत्याकांड में लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर की ट्रायल कोर्ट ने आनंद मोहन को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने दिसंबर 2008 में ट्रायल कोर्ट का फैसला आंशिक रूप से बदलते हुए फांसी की सजा को कठोर उम्रकैद में परिवर्तित कर दिया। बाद में वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद आनंद मोहन जेल में सजा काटते रहे, लेकिन 2023 में नियमों में बदलाव के बाद उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया गया।
यह मामला वर्ष 1994 का है, जब गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया आधिकारिक कार्य से पटना से लौट रहे थे। उसी दौरान मुजफ्फरपुर जिले के खबरा गांव के पास गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली जा रही थी।बताया जाता है कि छोटन शुक्ला की हत्या से नाराज भीड़ ने प्रशासन के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करते हुए जी. कृष्णैया की सरकारी गाड़ी को रोक लिया। इसके बाद उन्हें वाहन से बाहर निकालकर बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।जांच के दौरान आरोप लगा कि उस समय बिहार पीपुल्स पार्टी के नेता और तत्कालीन विधायक आनंद मोहन ने भीड़ को उकसाया था। इसी मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
आनंद मोहन की रिहाई केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक विवाद का भी विषय बनी थी। बिहार सरकार द्वारा जेल नियमों में संशोधन किए जाने के बाद विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए थे। कई पूर्व अधिकारियों और सामाजिक संगठनों ने भी इसे न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताया था।वहीं सरकार का पक्ष रहा कि संशोधित नियमों के तहत सभी पात्र कैदियों को समान आधार पर राहत दी गई और किसी एक व्यक्ति को विशेष लाभ नहीं पहुंचाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत यह तय करेगी कि बिहार सरकार द्वारा जेल नियमों में किया गया संशोधन और उसके आधार पर आनंद मोहन की समय पूर्व रिहाई कानून की कसौटी पर सही थी या नहीं।
इस फैसले का असर केवल आनंद मोहन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में समय पूर्व रिहाई से जुड़े मामलों और सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ गंभीर अपराधों पर बनने वाली कानूनी मिसाल पर भी पड़ सकता है। इसलिए पूरे देश की नजर अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है।