1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jun 03, 2026, 1:22:11 PM
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सियासी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी में बढ़ते असंतोष के बीच बुधवार को ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने बंगाल की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी। टीएमसी के 58 विधायक विधानसभा पहुंचे और स्पीकर को एक अलग प्रस्ताव सौंपते हुए खुद को “असली तृणमूल” का प्रतिनिधि बताया।
जानकारी के अनुसार, ये सभी विधायक पार्टी से निष्कासित नेताओं ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा के संपर्क में बताए जा रहे हैं। दोनों नेताओं ने 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। प्रस्ताव में दावा किया गया है कि यही विधायक तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इतना ही नहीं, इन विधायकों ने विरोधी दल के नेता के रूप में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के नाम का प्रस्ताव रखा है। वहीं पूर्व मंत्री अखरुजम्मान को मुख्य सचेतक बनाए जाने की मांग भी की गई है। इस कदम को पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, विवाद की शुरुआत उस समय हुई थी जब ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा ने विपक्ष के नेता के समर्थन से जुड़े एक प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी होने का आरोप लगाया था। इस शिकायत के बाद मामला विधानसभा सचिवालय तक पहुंचा और जांच के लिए केस दर्ज किया गया। फिलहाल पूरे मामले की जांच सीआईडी कर रही है।
इसी बीच पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। हालांकि निष्कासन के बाद भी दोनों नेताओं का असर पार्टी के कई विधायकों पर बना रहा, जिसका असर अब विधानसभा के भीतर साफ दिखाई देने लगा है।
दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व भी अपनी पकड़ मजबूत रखने की कोशिश में जुटा है। इससे पहले टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee ने विधानसभा अध्यक्ष को एक अलग प्रस्ताव सौंपा था। इसमें विरोधी दल के नेता के लिए Shobhandeb Chattopadhyay और मुख्य सचेतक के लिए Firhad Hakim के नाम का प्रस्ताव रखा गया था।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो हाल में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस 294 में से केवल 80 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी। ऐसे में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय खेमे द्वारा बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन का दावा पार्टी के लिए चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
कई राजनीतिक विश्लेषक इस स्थिति की तुलना साल 2022 में महाराष्ट्र में हुई शिवसेना की अंदरूनी टूट से भी कर रहे हैं।