1st Bihar Published by: FIRST BIHAR EXCLUSIVE Updated May 09, 2026, 9:01:09 PM
सम्राट सरकार का विजन - फ़ोटो रिपोर्टर
PATNA: बात करीब 16 साल पहले की यानि जून, 2010 की है. पटना के बंदर बागीचा के संतोषा अपार्टमेंट के फ्लैट में मैं दादा यानि दिग्विजय सिंह जी के साथ बैठा था. कुछ दिनों पहले ही दिग्विजय सिंह जी ने ललन सिंह, प्रभुनाथ सिंह, अखिलेश प्रसाद सिंह जैसे नीतीश कुमार से चोट खाये नेताओं के साथ मिलकर पटना के गांधी मैदान में किसान महापंचायत लगाई थी. मैं जानना चाह रहा था कि आगे की क्या रणनीति होगी? दिग्विजय बाबू ने कहा-प्रबोध, अभी लंदन जा रहा हूं. वहां से लौट कर आते हैं तो फिर आगे की रणनीति तैयार पर चर्चा करेंगे.
मेरे सामने ही उन्होंने अपने करीबी राजनीतिक कार्यकर्ता अनिल सिंह को सामान एयरपोर्ट पर भेजने को कहा. वहां एक-दो लोग और थे, उनका नाम जेहन में नहीं आ रहा है. लेकिन अनिल जी दिग्विजय बाबू का सामान लेकर गये थे, ये याद है. थोड़ी देर बाद दिग्विजय बाबू भी मुंबई रवाना हो गये, जहां से उन्हें लंदन जाना था.
दरअसल, 2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद उनके खिलाफ जब कभी भी गोलबंदी हुई तो उसके अंदर घुसकर तमाशा देखने की मेरी आदत हो गई थी. नीतीश के सत्ता में आने के बाद उपेंद्र कुशवाहा अलग हुए, 2007 में मंत्रिमंडल के फेरबदल के बाद मोनाजिर हसन, अजीत कुमार, रेणू कुशवाहा जैसे लोगों ने विरोध का बिगुल बजाया, शंभू शरण श्रीवास्तव ने आवाज उठाई, प्रभुनाथ सिंह अलग हुए, ज्ञानू सिंह ने साथ छोड़ा या फिर ललन सिंह ने विद्रोह किया. मैं ऐसे हर वाकये में अंदर तक घुसा रहा. वैसे ये भी साफ दूं कि अपना वास्ता सिर्फ खबर से था. खबर पहले मेरे पास आये, बाकी और कुछ चाह नहीं थी.
खैर, बात दिग्विजय बाबू की हो रही थी. दिग्विजय बाबू भी नीतीश कुमार से चोट खाये थे. 2010 में उन्होंने ललन सिंह, प्रभुनाथ सिंह, राजद छोड़ने वाले अखिलेश सिंह जैसे तमाम नेताओं को गोलबंद किया और नीतीश कुमार के खिलाफ नई लड़ाई शुरू की थी. इसी दौरान पटना के गांधी मैदान में किसान महापंचायत बुलाई गई थी औऱ हम आदत से मजबूर होकर इस पॉलिटिकल ड्रामें में अंदर तक घुसे पड़े थे. इसी दौरान दिग्विजय बाबू से भी प्रगाढ़ संबंध बने और फिर मैंने समझा कि उस नेता के अंदर कितनी ज्यादा काबिलियत थी.
वैसे, बात मैं कर रहा था कि दिग्विजय बाबू के लंदन जाने की. वे पटना से मुंबई और फिर वहां से लंदन रवाना हो गये. मुझे याद है कि जब वे लंदन रवाना होने से पहले मुंबई में थे तो वहां से भी हमारी मोबाइल पर भी बातचीत हुई थी. लेकिन चार-पांच दिन बाद ही जो खबर मिली, उसने मुझे स्तब्ध कर दिया. पता चला कि लंदन में ही उनकी तबीयत बिगड़ी और वहीं उनका निधन हो गया. बाद में उनका पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक गांव लाया गया तो मैं भी उन्हें आखिरी श्रद्धांजलि देने पहुंचा था. नीतीश कुमार भी उनकी अंत्येष्टि में पहुंचे थे.
अब आपके जेहन में ये सवाल उठ सकता है कि मैं 16 साल बाद दिग्विजय बाबू की बात क्यों कर रहा हूं. दरअसल, मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि दिग्विजय सिंह अपने दौर के सबसे काबिल नेताओं में से एक थे. उन्हें राजनीति में वह स्थान नहीं मिल पाया, जो मिलना चाहिये था. उनकी सोच बड़ी थी, जिसे पूरा किये बगैर वे चले गये.
मैं दिग्विजय बाबू की सोच को आज के दौर से जोड़ रहा हूं. 7 मई को सम्राट चौधरी के कैबिनेट का विस्तार हुआ है. मुझे हैरानी हो रही है कि मीडिया के लोग और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर विमर्श क्यों नहीं कर रहे हैं कि सम्राट चौधरी ने अपने विजन को पूरा करने के लिए किन मंत्रियों पर दांव लगाया है. अगर आप सम्राट चौधरी के विजन को समझेंगे तो पता चलेगा कि उन्होंने तीन चेहरों पर सबसे ज्यादा भरोसा किया है. वे तीन मंत्री हैं- ई. शैलेंद्र, नीतीश मिश्रा और श्रेयसी सिंह. इन तीनों में भी श्रेयसी सिंह औऱ नीतीश मिश्रा का रोल सबसे अहम है.
2025 के विधानसभा चुनाव के बाद सम्राट चौधरी से मेरी चार-पांच दफे मुलाकात हुई है. इन तमाम मुलाकात में सम्राट चौधरी ने दो बातों का जिक्र जरूर किया. पहला- बिहार में कम से कम पांच लाख करोड़ का निवेश लाना है, इसके लिए जो भी करना हैं वह करेंगे. दूसरा- बगैर नये टाउनशिप बने बिहार का विकास संभव नहीं है. इसलिए नये टाउनशिप बनाने ही होंगे.
यानि सम्राट चौधरी का सबसे बडा विजन है बिहार में निवेश लाना. निवेश कैसे आयेगा-उद्योग के जरिये और सम्राट चौधरी ने अपने सबसे बड़े विजन यानि बिहार का औद्योगिकरण करने की जिम्मेदारी एक नये चेहरे को सौंपे दी है. 32 मंत्रियों की फौज में से सम्राट किसी को भी उद्योग मंत्री बना सकते थे. ऐसे नेता भरे पड़े हैं जो पुरानी, घिसी-पिटी सोच लेकर रोज रूटीन बयानबाजी करते और बिहार के औद्योगिकरण पर “status quo” लगा रहता. नारे और घोषणाओं पर जनता झूमती लेकिन सम्राट का विजन 2030 तक झूलता ही रह जाता.
अब श्रेयसी सिंह को उद्योग मंत्री बनाने के मायने समझिये. सम्राट चौधरी जानते हैं कि श्रेयसी सिंह के सहारे वे जनता को बहलाने वाले बड़े-बड़े दावे नहीं कर पायेंगे. लोगों को कमोबेश वही बताया जायेगा जो वाकई हो रहा होगा. नये दौर की श्रेयसी सिंह राजनीति को करियर की तरह लेने वाली प्रोफेशनल हैं. वे चाह कर भी लोगों के सामने गलत नहीं बोल पायेंगी. जाहिर है ऐसे मंत्री का फोकस परिणाम यानि रिजल्ट पर होगा.
मेरा मानना है कि हमने इस दौर में राजनीति को गंभीरता से समझना और परखना छोड़ दिया है. अगर किसी ने 2025 के बाद बनी सरकार के कामकाज को सही से देखा होता तो उन्हें लगता कि खेल मंत्री बनाई गई श्रेयसी सिंह किस प्रोफेशनल तरीके से काम कर रही थीं. करीब दो महीने पहले मैं जब दिल्ली से पटना पहुंचा तो देखा कि एयरपोर्ट अराइवल पर बुके-गुलदस्ते के साथ मंत्री श्रेयसी सिंह खड़ी हैं. मैंने वहां खड़े लोगों से पूछा कि भाई मंत्री जी, किसके स्वागत के लिए खड़ी हैं. पता चला कि टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप की विजेता भारतीय टीम के सदस्य ईशान किशन पटना आने वाले हैं औऱ मंत्री उनका स्वागत करने के लिए खड़ी हैं. वर्ल्ड कप चैंपियन टीम में किसी बिहारी का शामिल होना बड़े गौरव की बात थी. लेकिन सरकार के स्तर पर कोई हलचल नहीं थी. सरकार सोई पड़ी थी.
लेकिन श्रेयसी सिंह को इसका अंदाजा था कि बिहार के एक क्रिकेटर ने क्या कमाल कर दिखाया है. जाहिर है, ईशान किशन ने तो श्रेयसी सिंह को फोन कर ये नहीं बताया होगा कि मैं पटना पहुंच रहा हूं. लेकिन, श्रेयसी को पता था कि वह बिहार की खेल मंत्री हैं और राज्य का गौरवान्वित करने वाले खिलाड़ी का स्वागत करना उनका कर्म औऱ धर्म दोनों है. लिहाजा वे सीधे एयरपोर्ट पहुंच गईं.
बगैर किसी शोर शराबे के श्रेयसी ने ऐसे कई काम किये. नीतीश कुमार ने अपनी अघोषित राजधानी राजगीर में बड़ा क्रिकेट स्टेडियम बना दिया. लेकिन उस स्टेडियम में मैच कराने की फिक्र श्रेयसी को हुई. लिहाजा वे आईपीएल की एक फ्रेंचाइजी के पास पहुंच गईं. इस डिमांड के साथ कि वह अपने टीम के कुछ मैच राजगीर में करवाये. क्रिकेट जगत में धूम मचा रहे बिहार के एक औऱ सपूत वैभव सूर्यवंशी को सम्मान दिलाने में श्रेयसी बॉडी लैग्वेंज बता रहा था कि खेल औऱ खिलाड़ियों के प्रति उनकी सोच क्या है. ऐसे कई उदाहरण मेरे जेहन में हैं, जो श्रेयसी बगैर हो-हल्ला मचाये कर रही थीं.
कुछ साल पहले नोबेल प्राइज विजेता डेरॉन एसमोग्लू और जेम्स ए. रॉबिन्सन की किताब Why Nations Fail पढ़ी थी. किताब का सार यही है कि किसी देश या राज्य की समृद्धि या गरीबी का असली कारण उसकी राजनीतिक संस्थाएं होती हैं, न कि उसकी किस्मत, भूगोल या संस्कृति. शायद सम्राट चौधरी समझ रहे हैं कि बिहार अगर औद्योगिकरण या शहरीकरण में फिसड्डी है तो इसके लिए राजनीतिक संस्थायें(सरकार) ही जिम्मेवार है. बिहार के भूगोल या संस्कृति को विफलता का कारण बताने वाले लोग जनता को झांसा दे रहे होते हैं. तभी उन्होंने अपने विजन को पूरा करने के लिए श्रेयसी सिंह से लेकर नीतीश मिश्रा जैसे पेशेवर राजनेताओं को चुना है.
मैं बड़ी शिद्दत से महसूस करता हूं कि सिर्फ वोट लेकर बैठ जाने वाले नेताओं के बजाय समाज के लिए कुछ करने की चाह रखने वाले श्रेयसी जैसे नेता ही बिहार की किस्मत बदलेंगे. उनमें खाये-पकाये नेताओं की तुलना में इमानदारी ज्यादा है, उनका विजन और दूरदर्शिता स्पष्ट है. उनके जेहन में ये बात है कि 5 या 10 साल बाद हमारा राज्य कैसा होगा. जनता से लेकर विकास के दूसरे स्टेकहोल्डर्स से संवाद में उनका ईगो आड़े नहीं आयेगा. फैसले लेने से पहले वे जोड़-घटाव कम करेंगे. नई चीजों को सीखने में उन्हें हिचक नहीं होगी और लक्ष्य को हासिल करने के लिए ज्यादा Adaptability (लचीलापन) होगा. उन्हे शायद अपनी गलतियों को स्वीकारने और उससे सीख लेने में हिचक भी कम होगी.
शायद तभी मुझे बिहार के उद्योग मंत्री की कुर्सी पर श्रेयसी सिंह का बैठना अच्छा लग रहा है. उनके चेहरे पर दिग्वजिय बाबू वाली चमक भी दिख ही जाती है. शायद श्रेयसी की नई राजनीति और विरासत में मिली समझ बिहार के काम आ जाये. सम्राट चौधरी का विजन पूरा हो जाये तो वाकई बिहार की किस्मत काफी हद तक बदल सकती है.