Premanand Maharaj: वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्री हित प्रेमानंद जी महाराज अपने सत्संगों में तीर्थ यात्रा के महत्व पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हैं। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि परमात्मा सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन उनका अनुभव करने के लिए हृदय की पवित्रता आवश्यक है। यह पवित्रता तीर्थ स्थलों की यात्रा से प्राप्त होती है।
प्रेमानंद महाराज उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे दूध में घी छिपा होता है, लेकिन उसे पाने के लिए दही जमाना, मंथन करना और गर्म करना पड़ता है, उसी प्रकार भगवान की प्राप्ति के लिए साधना और शुद्धता जरूरी है। तीर्थ यात्रा साधक को वही पवित्रता प्रदान करती है, जिससे ईश्वर का अनुभव संभव हो पाता है। उनके अनुसार, तीर्थ यात्रा हर व्यक्ति के जीवन में आवश्यक है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं, “परमात्मा सर्वत्र हैं, लेकिन उन्हें पाने की प्रक्रिया साधना है और साधना के लिए पवित्रता चाहिए।” हरिद्वार, काशी, वृंदावन तथा गंगा-यमुना के तट जैसे तीर्थ स्थलों का वातावरण, मंत्रों का कंपन और वहां की दिव्य ऊर्जा मन और हृदय को शुद्ध करती है। इससे व्यक्ति के भीतर छिपे पाप और नकारात्मक भाव नष्ट होते हैं। वे यह भी कहते हैं कि गंगा स्नान तभी फलदायी होता है, जब उसे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किया जाए।
महाराज जी के अनुसार, तीर्थ स्थलों की स्थापना का उद्देश्य ही मनुष्य के पापों और दोषों का नाश करना है। यदि जीवन में अनजाने में कोई गलती हो जाए, तो तीर्थ यात्रा से उसका प्रायश्चित संभव है। तीर्थ यात्रा गृहस्थ जीवन में भी नई साधना का मार्ग प्रशस्त करती है। वहां उपवास, स्नान और पूजा से तन और मन दोनों की शुद्धि होती है।
वे तीर्थ यात्रा के दौरान नियमों का पालन करने की सलाह देते हुए कहते हैं कि कम से कम एक दिन पूर्ण उपवास करना चाहिए। यदि यात्रा तीन दिन की हो, तो पहले दिन उपवास, दूसरे दिन फलाहार और तीसरे दिन अन्न ग्रहण करना उत्तम होता है। तीर्थ यात्रा के दौरान होने वाला कष्ट भी पुण्य प्रदान करता है, क्योंकि इससे अहंकार का नाश होता है।
प्रेमानंद जी यह भी कहते हैं कि तीर्थ स्थलों पर यदि कोई अनहोनी हो जाए, तो नकारात्मक विचार नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार, “शरीर तो नश्वर है, लेकिन यदि हरिद्वार, काशी या वृंदावन जैसे तीर्थों पर प्राण त्याग हो, तो जीव को उत्तम गति प्राप्त होती है।” अनंत जन्मों से भटकता हुआ जीव तीर्थ स्थल पर देह त्याग कर भगवान की प्राप्ति कर सकता है, जिसे वे बड़ा आध्यात्मिक लाभ बताते हैं।
श्री हित प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि तीर्थ यात्रा को विधि-विधान से करने पर दिव्य अनुभूति होती है। पूजा, स्नान, उपवास और भक्ति के माध्यम से तीर्थ स्थल साधक को अध्यात्म का पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। इन स्थानों पर जाने से मन निर्मल होता है, सद्भाव जागृत होते हैं और ईश्वर का साक्षात्कार संभव होता है।
वे हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार प्रमुख तीर्थ स्थलों—काशी, वृंदावन और हरिद्वार—की यात्रा करने की सलाह देते हैं। इससे जीवन में नई ऊर्जा, भक्ति और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है। प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, तीर्थ यात्रा न केवल शरीर और मन को शुद्ध करती है, बल्कि मोक्ष के मार्ग को भी प्रशस्त करती है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियों की पूर्ण सत्यता और सटीकता का हम दावा नहीं करते हैं। अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ या धर्माचार्य से परामर्श अवश्य लें।


