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Bihar News: क्यों छठ पूजा में पहले डूबते फिर उगते सूर्य को दिया जाता है अर्घ्य? जान लीजिए वजह

Bihar News: बिहार में लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आज खरना पूजा का दिन है, जो छठ महापर्व का दूसरा और बेहद पवित्र चरण माना जाता है।

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बिहार समाचार: बिहार में लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आज कर्ण पूजा का दिन है, जो छठ महापर्व का दूसरा और अत्यंत पवित्र चरण माना जाता है। इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के बाद गुड़-चावल की खीर, रोटी और दूध से बासी प्रसाद का सेवन करते हैं। इसके बाद व्रती 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू करते हैं, जो सप्तमी तिथि की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूरा होता है।


छठ पूजा का तीसरा दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जब व्रती परिवार के साथ डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अगले दिन सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने से चार दिव्य पर्वों का आगमन होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य देव को राजा का दर्जा दिया गया है, जो जीवन में भाग्य, सफलता और निरोगी काया का प्रतीक हैं। छठ व्रत के माध्यम से अनंत सूर्य देव से स्वास्थ्य, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।


छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा के पीछे गहरा सिद्धांत और धार्मिक अर्थ निहित है। डूबते सूर्य को जल निक्षेप करना उस जीवन चरण का प्रतीक है जब व्यक्ति को अपनी तपस्या और परिश्रम का फल मिलना शुरू हो जाता है। यह जीवन में संतुलन, ऊर्जा और आत्मबल बनाये रखने का भी प्रतीक है। यह परंपरा भी प्रचलित है कि हर अस्त के बाद एक नया सूर्योदय होता है, अर्थात जीवन की हर मंजिल के बाद एक नई आशा और शुरुआत होती है।


धार्मिक सिद्धांत के अनुसार, डूबते समय सूर्य देव अपनी दूसरी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं। इस समय अर्घ्य देने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और मन की शांति होती है। शास्त्रों में सूर्य के तीन स्वरूप बताए गए हैं, प्रातः में ब्रह्मा, द्वितीय में विष्णु और सायं में महादेव (शिव)। ऐसा माना जाता है कि साधू के समय सूर्य की पूजा करने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है और जीवन भर दीर्घायु प्राप्त होती है।


इस साल पटना बिहार सहित सभी घाटों की साफ-सफाई और सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन ने दांतों की रोशनी और दर्शन के लिए घाटों की व्यवस्था की है, ताकि व्रती और सुरक्षित वातावरण में सूर्य की आराधना की जा सके। घाटों पर पारंपरिक सामग्री और लोकसंगीत की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा है।

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PRIYA DWIVEDI

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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