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Tamasha: फिल्म ‘तमाशा’ के बेहतरीन डायलॉग्स, जो हमें अपने अंदर के हीरो से मिलाती हैं

रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की विशेष फिल्म 'तमाशा' (2015) के बेहतरीन डायलॉग्स, जो आज की युवा पीढ़ी की उलझनों और सपनों को काफी अच्छे से बयान करते हैं, इस फिल्म ने कई युवाओं की आँखें ऐसे खोलीं कि अब वे दुनिया को और खुद को अलग नजरों से देखने लगे हैं.

Tamasha
Tamasha
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Deepak KumarDeepak Kumar|
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 “अंदर से कुछ और ही हैं हम.. और बाहर से मजबूर”   

वेद का यह डायलॉग आज की युवा पीढ़ी की उस उलझन को दर्शाता है, जहां वे अपने सपनों को छिपाकर समाज की उम्मीदों के पीछे भागते हैं और अंत में पाते हैं कि वे कहीं के नहीं रहे, इससे बेहतर होता यदि वे बेधड़क अपने सपनों के पीछे भागते, बिना किसी की परवाह किए हुए।     


 “वो तो एक्टिंग थी ना.. वो मैं रोल प्ले कर रहा था और ये मैं रियल में हूँ”  

वेद का यह डायलॉग उस दोहरे जीवन को दर्शाता है, जो हम समाज के लिए नकली चेहरा लगाकर जीते हैं। हालांकि, इससे कोई फायद नहीं होता, उल्टा हमारा कीमती समय समाज को प्रसन्न करने की कोशिश में खर्च हो जाता है, दुःख की बात ये है कि वे लोग हमसे फिर भी खुश नहीं हो पाते। 


ये तुम नहीं हो वेद। ये सब नकली है।”   

तारा का यह डायलॉग वेद को उसकी असली पहचान की याद दिलाता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने असली स्वभाव को अपनाना चाहिए। चाहे कोई लाख शिकायतें करे, हमें गलत साबित करने की कोशिश करे.. मगर हमें यह याद रखना है कि हम कौन हैं, मरते दम तक। 


क्योंकि सब भाग रहे हैंइसलिए मैं भी भाग रहा हूँ”   

यह डायलॉग समाज के पीछे अंधी दौड़ को उजागर करता है। हम दूसरों की देखा-देखी सफलता के पीछे भागते हैं, वो भी अपने सपनों को भूलकर। इसे रैट रेस भी कहा जाता है, जाने कितने अनोखे सितारे इस भेड़ चाल के चक्कर में अंदर से खोखले हो गए और एक दिन चल बसे। मिला क्या अंत में? कुछ भी नहीं सिवाय निराशा और पछतावे के।


किसे चाहिए मन का सोनाआँख के मोती। किसे पड़ी है अंदर क्या है।”  

यह डायलॉग आज की भौतिकवादी दुनिया पर तंज है, जहां लोग बाहरी चमक को महत्व देते हैं, न कि अंदर की भावनाओं को। किसी को फर्क नहीं पड़ता आप अंदर से कितने अनमोल और विशेष हैं, सबका बस एक सवाल.. पैसे कितने कमाते हो? उसी के आधार पर हमारा महत्त्व तय किया जाता है।


बचपन मुझसे कहता है मैं बहुत स्पेशल हूँ। लेकिन उसको तो मैंने कुचल दिया।”  

वेद का यह डायलॉग हर उस इंसान से जुड़ता है, जो बचपन के सपनों को वयस्कता की जिम्मेदारियों में खो देता है। वह विशेष से आम हो जाता है, खुद को इस औसत सी भीड़ का हिस्सा बना लेता है और सोचता है वह भी इस बोरिंग जीवन के लिए ही बना है, वह भूल जाता है कि कभी वह अपनी दुनिया का राजा था, कई वर्षों के बाद खुद को बस एक गुलाम के रूप में पाता है, जिसे यह भी याद नहीं रहता कि उसने कौन-कौन से सपने खुद के लिए कभी देखे थे।


 “डरता हैडर लगता हैअपनी कहानी मुझसे पूछता हैकायर.. तो किससे डरता हैबताबोल अपनी कहानी.. क्या है तेरे दिल के अंदर?”  

यह डायलॉग हमें अपने डर का सामना करने और अपनी सच्ची कहानी को जीने की प्रेरणा देता है। यह हमें बतलाता है कि हमें दूसरों से अपनी कहानी नहीं पूछनी चाहिए बल्कि खुद अपने मन के अंदर झांक कर देखना चाहिए। फिर जो जवाब मिलता है न, वही सत्य है, वही सबसे बेहतरीन रास्ता है और वही हमें हमारी असली मंजिल की ओर ले जाता है। 


पसंद नहीं आई एंडिंगतो बदल दो!”   

यह फिल्म का सबसे बेहतरीन डायलॉग है। बयान नहीं किया जा सकता जब इस लाइन को पहली बार सुना था तो क़ितनी ख़ुशी महसूस हुई थी। यह हमें याद दिलाता है कि हम अपनी जिंदगी की कहानी के लेखक स्वयं हैं और इसे बदलने का हमें हक़ भी है और इतनी काबिलियत भी है कि हम अपनी कहानी को जिधर चाहें उधर मोड़ सकते हैं।

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Deepak Kumar

रिपोर्टर / लेखक

Deepak Kumar

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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