1st Bihar Published by: FIRST BIHAR Updated Apr 22, 2026, 10:08:59 AM
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First IPS officer India: जब देश में IPS अधिकारियों की बहादुरी और कार्यशैली की चर्चा होती है, तो बहुत कम लोग जानते हैं कि इस प्रतिष्ठित सेवा की नींव रखने वालों में चक्रवर्ती विजयराघवन नरसिम्हन का नाम सबसे आगे आता है। आजादी के बाद 1948 बैच के साथ उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा की शुरुआत में अहम भूमिका निभाई। उस समय उनकी पहली सैलरी लगभग 400 रुपये प्रतिमाह थी, जो उस दौर में सम्मानजनक मानी जाती थी।
सी. वी. नरसिम्हन का जन्म 21 मई 1915 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में हुई, जिसके बाद उन्होंने मद्रास और फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उस समय विदेश में पढ़ाई करना बेहद प्रतिष्ठित माना जाता था, जिसने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया।
उन्होंने 1937 में इंडियन सिविल सर्विस (ICS) ज्वाइन की, जो उस दौर की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा थी। मद्रास प्रेसिडेंसी में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और अपनी ईमानदारी व कार्यशैली से अलग पहचान बनाई। आजादी के बाद 1948 में जब भारतीय पुलिस सेवा की स्थापना हुई, तो वे इसके पहले अधिकारी बने—जो भारतीय प्रशासनिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण था।
आज जहां IPS अधिकारियों की सैलरी लाखों में होती है, वहीं नरसिम्हन ने मात्र 400 रुपये प्रतिमाह से अपनी सेवा शुरू की थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को कर्तव्य मानकर पूरी निष्ठा से निभाया।
उनका योगदान केवल पुलिस सेवा तक सीमित नहीं रहा। वे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक रहे, नेशनल पुलिस कमीशन में सदस्य सचिव की भूमिका निभाई और तमिलनाडु पुलिस में भी कई अहम पदों पर कार्य किया। इसके अलावा, वे संयुक्त राष्ट्र में एशिया और सुदूर पूर्व के लिए कार्यकारी सचिव भी रहे, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे विवेकानंद एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष और P.S. Charities के चेयरमैन रहे। उनके प्रयासों से चेन्नई के आसपास लगभग 24 स्कूलों का संचालन हुआ, जिससे हजारों बच्चों को शिक्षा का लाभ मिला।
उनकी उत्कृष्ट और ईमानदार सेवा के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए। वर्ष 1962 में पुलिस मेडल, 1971 में प्रेसिडेंट मेडल और 2001 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया। उनका जीवन समर्पण, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणादायक मिसाल है।