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Bihar Politics : मंत्रिमंडल गठन के बाद अब विभाग बंटवारे पर अटकी निगाहें, इस मंत्रालय के ‘अपशकुन’ की चर्चा फिर तेज

बिहार में नीतीश कुमार के दसवें मंत्रिमंडल का शपथग्रहण पूरा होने के बाद अब विभाग बंटवारे को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। खासकर उद्योग मंत्रालय पर लगे अपशकुन की चर्चा फिर गर्म हो गई है।

Bihar Politics : मंत्रिमंडल गठन के बाद अब विभाग बंटवारे पर अटकी निगाहें, इस मंत्रालय के ‘अपशकुन’ की चर्चा फिर तेज
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Bihar Politics : बिहार में नीतीश कुमार के दसवें मंत्रिमंडल का शपथग्रहण पूरा हो चुका है। 26 मंत्रियों के साथ एनडीए सरकार औपचारिक रूप से अस्तित्व में आ चुकी है। अब हर किसी की नजर सबसे अहम प्रक्रिया—विभागों के बंटवारे—पर टिकी है। कौन-सा मंत्री किस मंत्रालय की कमान संभालेगा, कौन अपने पुराने विभाग को बचा पाएगा, और किसे पहली बार बड़ा पोर्टफोलियो मिलेगा—इन सवालों का जवाब देने की उत्सुकता सत्ता गलियारों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक सभी में साफ देखी जा सकती है।


लेकिन इस चर्चा के बीच एक मंत्रालय ऐसा है, जिसने सामान्य राजनीतिक समीकरणों से ज्यादा सुर्खियां अपने साथ जुड़े मिथक और अंधविश्वास की वजह से बटोर ली हैं—उद्योग मंत्रालय। बिहार में पिछले कुछ वर्षों से यह मंत्रालय 'अपशकुनी' माना जाने लगा है। वजह यह है कि जिन्हें भी यह विभाग मिला, वे या तो अपनी कुर्सी बचा नहीं पाए, या फिर उनके राजनीतिक करियर में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। दिलचस्प यह है कि ऐसे तीन ताजा उदाहरण खुद इस धारणा को और मजबूत करते हैं।


जातीय गणित और राजनीतिक मान्यताएं तर्क से ज्यादा असरदार

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर विभागों के बंटवारे तक, हर चरण में सामाजिक समीकरणों का गहरा असर रहता है। इसके साथ ही कुछ राजनीतिक मान्यताएं और चलन भी हैं, जो अक्सर तर्क से ऊपर स्थान पा लेते हैं। यही कारण है कि नीतीश सरकार बनते ही उद्योग मंत्रालय को लेकर फैले पुराने अंधविश्वास ने फिर जोर पकड़ लिया है।


कहा जाता है कि उद्योग मंत्रालय संभालने वाले मंत्री कुछ ही समय बाद राजनीतिक मुश्किलों में फंस जाते हैं या फिर सीधे तौर पर मंत्री पद गंवा बैठते हैं। और यह दावा हवा में नहीं है—बीते तीन वर्षों के भीतर तीन बड़े राजनीतिक घटनाक्रम इस ‘विश्वास’ को और गहरा बना चुके हैं।


2021: शाहनवाज हुसैन बने थे उद्योग मंत्री, लेकिन 2022 में कुर्सी गई

सबसे पहले उदाहरण बीजेपी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज हुसैन का। 2021 में उन्हें विधान परिषद के जरिए मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और उद्योग मंत्रालय सौंपा गया। उनके काम और तेज़ी की प्रशंसा भी हुई, लेकिन 2022 में अचानक राजनीतिक समीकरण बदल गए। नीतीश ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन का दामन थाम लिया और इस बदलाव का पहला झटका शाहनवाज को लगा—मंत्री पद चला गया।


उनका वह बयान आज भी चर्चाओं में है, जब उन्होंने मजाक में कहा था—“प्लेन में बैठा तो मंत्री था, उतरते-उतरते भूतपूर्व हो गया।” यह वाक्य भी उद्योग मंत्रालय पर लगे ‘अपशगुन’ की कहानी को और दिलचस्प बनाता है।


2022: समीर महासेठ को मिला विभाग, 2024 में पद भी गया और चुनाव भी हारे

2022 में महागठबंधन सरकार बनने पर समीर महासेठ को उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने कई नई योजनाओं और निवेश प्रस्तावों पर तेजी से काम भी किया, लेकिन 2024 में नीतीश कुमार के फिर से एनडीए में लौटते ही उनका पद छिन गया। इतना ही नहीं, वे हालिया चुनाव में भी मधुबनी सीट से हार गए। इस घटनाक्रम ने उद्योग मंत्रालय से जुड़े मिथक को एक और मजबूती दे दी कि यह विभाग राजनीतिक रूप से ‘मुश्किलें’ लेकर आता है।


2024: नीतीश मिश्रा भी नहीं बच पाए, जीतने के बावजूद नहीं बने मंत्री

तीसरा उदाहरण BJP के नीतीश मिश्रा का है। उन्हें 2024 में उद्योग मंत्रालय दिया गया और उन्होंने अपेक्षाकृत कम समय में अच्छा काम भी किया। निवेश की संभावनाओं को बढ़ाने और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में कई सुधारों के लिए उन्हें सराहना भी मिली। लेकिन नतीजा वही निकला—इस बार वे चुनाव जीतने के बावजूद मंत्रिमंडल में जगह नहीं पा सके। इससे उद्योग मंत्रालय का 'अपशकुन' और गहरा बताया जाने लगा।


वित्त मंत्रालय भी माना जाता है चुनौतीपूर्ण, लेकिन सम्राट चौधरी अपवाद

उद्योग मंत्रालय के साथ ही वित्त विभाग भी बिहार में एक मुश्किल मंत्रालय माना जाता है। सुशील मोदी से लेकर तारकिशोर प्रसाद तक, कई नेताओं को इस विभाग के बाद राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, मौजूदा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी इस धारणा को गलत साबित करते दिख रहे हैं। 2024 से वित्त मंत्रालय उनके पास है और माना जा रहा है कि नई सरकार में भी यह विभाग उनके पास ही रहने वाला है। इससे कम-से-कम वित्त विभाग से जुड़ा ‘मिथक’ टूटता हुआ नजर आ रहा है।


सबकी निगाहें—नया उद्योग मंत्री कौन होगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उद्योग मंत्रालय इस बार किसके हिस्से आएगा? और क्या वह नेता इस विभाग से जुड़े पुराने अंधविश्वास को तोड़ पाएगा?NDA सरकार में मंत्री पदों का बंटवारा जातीय संतुलन, राजनीतिक अनुभव और गठबंधन की साझेदारी को देखते हुए होगा। ऐसे में उद्योग मंत्रालय किसे मिलता है, यह फैसला कई संकेत भी देगा—नीतीश कुमार किस नेता पर भरोसा कर रहे हैं, किस समुदाय को संतुलित कर रहे हैं, और क्या वे इस बार ‘अपशकुनी मंत्रालय’ की छवि बदलना चाहते हैं? जवाब कुछ ही दिनों में साफ हो जाएगा, मगर फिलहाल बिहार की राजनीति में एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है—“क्या उद्योग मंत्रालय का अपशगुन इस बार टूटेगा?”

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रिपोर्टर / लेखक

Tejpratap

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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