Bihar election : बिहार में कहने को तो चालीस दिनों का चुनावी महापर्व मनाया गया, पर असल में इसकी गूंज तीन माह पहले से ही राजदरबार के गलियारों में सुनाई देने लगी थी। सत्ता के सिंहासन को पाने की लालसा, दरबारियों की चहलकदमी, संदेशवाहकों की दौड़भाग और आमजन की उम्मीदों का शोर—सब मिलकर ऐसा दृश्य रच रहे थे मानो पूरा प्रदेश एक विराट राजनीतिक यज्ञ में सहभागी हो।
इन चालीस दिनों में बिहार की धरती पर जो दिखा, वह केवल चुनाव नहीं था; वह शक्ति और प्रतिष्ठा का ऐसा अनुष्ठान था, जिसमें हर ओर सजधज, व्यवहार, रणनीति और मुकाबले का रंग घुला हुआ था। आम लोगों से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक, और चुनावी महकमे के कर्मियों से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक हर किसी ने अपनी-अपनी भूमिका में ऐसा श्रम किया कि कई चेहरे तो थकान में भी मुस्कुरा रहे थे और कई आंखें परिणाम की बेचैनी में रातें काट रही थीं।
पर इस महापर्व के पीछे कई ऐसी अनकही कहानियाँ भी छुप गईं, जिन्हें किसी मंच पर जगह नहीं मिली। किसी अधिकारी ने घर से दूर रातें काटीं, तो किसी कर्मी ने पसीना बहाते हुए गर्म सड़क और उमस में बूथ से लेकर वापसी तक की यात्रा पूरी की। कार्यकर्ताओं ने अपनी दिनचर्या भूलकर नेताओं का संदेश घर–घर पहुँचाया, कई परिवारों ने अपने सदस्य तक को ठीक से नहीं देखा। यह चुनाव न केवल मतदाताओं के लिए यादगार रहा, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए भी, जिनकी मेहनत ने इसे सफल बनाया।
और फिर आया चुनाव के बाद का राजसी दौर—जहाँ जश्न के शंख की आवाज़ धीमी पड़ चुकी थी, ढोल-नगाड़ों की प्रतिध्वनि थम गई थी, पर दरबार में अब एक अलग गहमागहमी शुरू हो चुकी थी। राज्य के चुनावी महकमे में आजकल एक नया दृश्य दिख रहा है—अफसरों के टेबल पर कागज़ों के ढेर, लैपटॉप की खनक, फाइलों की आवाजाही और खर्चों के हिसाब-किताब का तामझाम। वह चमक भले गायब हो गई हो, पर मेहनत का बोझ पहले से भारी हो गया है।
ऐसे ही समय में एक अधिकारी से किसी ने हँसते हुए पूछा, “महाराज, अब आगे क्या हो रहा है?” अधिकारी ने थके चेहरे पर बनावटी मुस्कान ओढ़ते हुए राजदरबार की भाषा में उत्तर दिया—“बारात का तामझाम खत्म हुआ, अब कुर्सी-टेबल और हलवाई का हिसाब हो रहा है।”बस इतना कहना था कि दरबार में मौजूद सारे कर्मी खिलखिलाकर हँस पड़े। मानो किसी ने ठिठोली में ही सही, पूरे चुनावी प्रक्रिया का सार एक ही वाक्य में समझा दिया हो।
राजनीति का महापर्व भले समाप्त हो गया हो, पर उसकी परछाइयाँ अभी भी दफ्तरों की फाइलों पर झूम रही हैं। गाड़ियों की गूंज, सुरक्षा दस्तों का शोर, नेताओं की आवाजाही और कैमरों की चमक भले धीमी हो गई हो, पर खर्चों के दस्तावेज, टेंडर का भुगतान, बूथ का हिसाब और रिपोर्टों का लेखा-जोखा अब नई व्यस्तता का स्वरूप बन चुका है। राजदरबार की यही परंपरा है—उत्सव बीत जाता है, पर पीछे छूट जाते हैं कर्म, अनुभव, यादें और वे छोटी-बड़ी कहानियाँ, जो आने वाले समय में फिर किसी नए चुनावी पर्व की प्रस्तावना बन जाती हैं।






