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Bihar Vidhan Sabha rules : बिहार विधानसभा की कार्यवाही के नियम: प्रश्नकाल से स्थगन प्रस्ताव तक, जानिए सत्र में कैसे उठते हैं सवाल

बिहार विधानसभा की कार्यवाही किन नियमों से चलती है? प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव और अध्यक्ष की शक्तियों की पूरी जानकारी पढ़ें।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Feb 20, 2026, 8:26:56 AM

Bihar Vidhan Sabha rules : बिहार विधानसभा की कार्यवाही के नियम: प्रश्नकाल से स्थगन प्रस्ताव तक, जानिए सत्र में कैसे उठते हैं सवाल

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Bihar Vidhan Sabha rules : लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाले बिहार विधानसभा की कार्यवाही तय नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित होती है। अक्सर सत्र के दौरान विधायक प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव या व्यवस्था के प्रश्न को लेकर हंगामा करते दिखते हैं। लेकिन इन सबके पीछे एक विस्तृत नियमावली काम करती है, जिसे “प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम” कहा जाता है।


संवैधानिक आधार क्या है?

राज्य विधानमंडल को अपने कार्य संचालन के नियम बनाने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 208 के तहत मिला है। वहीं अनुच्छेद 194 विधायकों को विशेषाधिकार और शक्तियाँ प्रदान करता है। इन्हीं प्रावधानों के आधार पर बिहार विधानसभा की नियमावली तैयार की गई है, जो यह तय करती है कि सदन में कौन, कब और कैसे अपनी बात रखेगा।


प्रश्नकाल: जवाबदेही का पहला मंच

हर कार्य दिवस की शुरुआत प्रश्नकाल से होती है। आमतौर पर एक घंटे के इस समय में विधायक सरकार से विभागवार सवाल पूछते हैं। प्रश्न दो प्रकार के होते हैं—


तारांकित प्रश्न: जिनका मौखिक उत्तर दिया जाता है और पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।


अतारांकित प्रश्न: जिनका लिखित उत्तर दिया जाता है।


अक्सर विधायक यह आरोप लगाते हैं कि उनका प्रश्न सूची में शामिल नहीं हुआ या उसे नियमों का हवाला देकर खारिज कर दिया गया। ऐसे मामलों में अध्यक्ष का निर्णय अंतिम माना जाता है।


शून्यकाल: तात्कालिक मुद्दों की आवाज

प्रश्नकाल के बाद शून्यकाल होता है। यह नियमावली में मूल रूप से उल्लेखित नहीं था, बल्कि संसदीय परंपरा से विकसित हुआ। इस दौरान विधायक बिना लंबी पूर्व सूचना के जनहित के तात्कालिक मुद्दे उठाते हैं। कई बार शून्यकाल में बोलने के लिए सीमित समय होने के कारण विवाद होता है। विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।


स्थगन प्रस्ताव: कार्यवाही रोकने की मांग

जब कोई मामला अत्यंत गंभीर और तात्कालिक हो, तो विधायक स्थगन प्रस्ताव लाकर सदन की सामान्य कार्यवाही रोककर चर्चा की मांग कर सकते हैं। यह प्रस्ताव तभी स्वीकार होता है जब अध्यक्ष उसे नियमों के अनुरूप और पर्याप्त महत्व का मानें। स्थगन प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने पर विपक्ष द्वारा विरोध दर्ज कराना आम बात है।


ध्यानाकर्षण प्रस्ताव: सरकार का ध्यान खींचने का माध्यम

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए विधायक किसी गंभीर प्रशासनिक या सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर संबंधित मंत्री का ध्यान आकर्षित करते हैं। मंत्री को सदन में जवाब देना होता है। कई बार यह सवाल उठता है कि नोटिस समय पर दिया गया था या नहीं और क्या विषय नियमों की कसौटी पर खरा उतरता है।


बजट सत्र और कटौती प्रस्ताव

बजट सत्र के दौरान विधायक अनुदान मांगों पर चर्चा करते हैं। यदि किसी विभाग की नीति या खर्च पर आपत्ति हो तो कटौती प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसके तीन प्रकार होते हैं—

नीति कटौती

आर्थिक कटौती

टोकन कटौती

हालांकि व्यवहार में ये प्रस्ताव अक्सर पारित नहीं होते, लेकिन सरकार को घेरने का यह एक प्रभावी संसदीय तरीका है।


व्यवस्था का प्रश्न और विशेषाधिकार

यदि किसी सदस्य को लगता है कि सदन की कार्यवाही नियमों के विरुद्ध चल रही है, तो वह व्यवस्था का प्रश्न उठा सकता है। अध्यक्ष यह तय करते हैं कि मामला वैध है या नहीं। इसी तरह, यदि किसी विधायक को अपने विशेषाधिकार के हनन का संदेह हो, तो वह विशेषाधिकार प्रस्ताव ला सकता है। मामला समिति को भेजा जा सकता है।


अध्यक्ष की भूमिका सबसे अहम

सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की पूरी जिम्मेदारी अध्यक्ष पर होती है। वे प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करते हैं। अनुशासन भंग होने पर सदस्य को चेतावनी या निलंबित कर सकते हैं। उनका निर्णय अंतिम माना जाता है। इसलिए कई बार विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच अध्यक्ष के फैसलों को लेकर भी तीखी नोकझोंक देखने को मिलती है।


क्यों उठते हैं बार-बार सवाल?

विधायक अक्सर इन मुद्दों पर आपत्ति दर्ज करते हैं—प्रश्न सूची में नाम क्यों नहीं आया? शून्यकाल में बोलने का मौका क्यों नहीं मिला? स्थगन प्रस्ताव क्यों खारिज हुआ? मंत्री का जवाब संतोषजनक क्यों नहीं है? दरअसल, विधानसभा की कार्यवाही केवल बहस का मंच नहीं, बल्कि नियमों से संचालित एक संवैधानिक प्रक्रिया है। इन नियमों की व्याख्या और अनुपालन को लेकर ही सदन में बहस और कभी-कभी हंगामा भी होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही प्रक्रिया सरकार को जवाबदेह बनाती है और जनता की आवाज सदन तक पहुंचाती है।