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Bihar News: MLC टिकट नहीं मिलने से दीपक प्रकाश पर संकट? सबसे बड़ा सवाल - बिहार NDA में ऑल इज वेल या पक रही कोई नई सियासी खिचड़ी

क्या बिहार NDA में सब कुछ ठीक चल रहा है? MLC उम्मीदवारों की सूची आते ही दीपक प्रकाश के भविष्य और उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक ताकत को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jun 07, 2026, 7:07:45 AM

Bihar News: MLC टिकट नहीं मिलने से दीपक प्रकाश पर संकट? सबसे बड़ा सवाल - बिहार NDA में ऑल इज वेल या पक रही कोई नई सियासी खिचड़ी

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Bihar mlc election:  बिहार में 18 जून को होने वाले विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद सत्ता पक्ष में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सबसे ज्यादा ध्यान बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य पर केंद्रित है, क्योंकि उनका नाम एनडीए के घोषित उम्मीदवारों में शामिल नहीं किया गया है।


विधान परिषद की 10 सीटों के लिए चुनाव होना है। बिहार विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए एनडीए को इनमें से 9 सीटों पर जीत का मजबूत दावेदार माना जा रहा है। ऐसे में टिकट वितरण को लेकर लिए गए फैसलों को राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


भारतीय जनता पार्टी ने अपने चार उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है, जबकि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने भी चार प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। वहीं एक सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के खाते में गई है। उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा उस नाम की हो रही है जो सूची में शामिल नहीं है—मंत्री दीपक प्रकाश।


दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। भारतीय संविधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनता है और वह विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है। यदि निर्धारित समय के भीतर वह किसी सदन का सदस्य नहीं बन पाता है, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।


यही वजह है कि एमएलसी चुनाव में उनका नाम नहीं आने के बाद उनके मंत्री पद को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उन्हें विधान परिषद में भेजने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जाती, तो आने वाले समय में उनके सामने संवैधानिक चुनौती खड़ी हो सकती है।


इस पूरे घटनाक्रम के बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और वरिष्ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा का नाम भी चर्चा में है। राजनीतिक हलकों में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि भाजपा और उपेंद्र कुशवाहा के बीच राजनीतिक तालमेल को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर रणनीति बनाई गई थी। जब भाजपा ने पहले उन्हें राज्यसभा भेजा था, तब इसे दोनों दलों के रिश्तों को मजबूत करने वाले कदम के रूप में देखा गया था।


सूत्रों के हवाले से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी चल रही है कि भविष्य में राजनीतिक सहयोग को लेकर जो संभावनाएं व्यक्त की जा रही थीं, उनमें अब कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि इन चर्चाओं को लेकर न तो भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है और न ही उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी की तरफ से कोई बयान जारी किया गया है।


राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए एनडीए के भीतर सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को नए सिरे से साधने की कोशिश हो रही है। इसी संदर्भ में चिराग पासवान की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और उनके प्रभाव को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि गठबंधन के भीतर विभिन्न सहयोगी दलों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर नई रणनीतियां बनाई जा रही हैं।


वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि एमएलसी चुनाव केवल विधान परिषद की सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एनडीए के भीतर भविष्य की राजनीतिक दिशा और नेतृत्व के प्रभाव का संकेत भी देगा। उम्मीदवारों के चयन से लेकर सीटों के बंटवारे तक हर फैसला व्यापक राजनीतिक संदेश देने वाला माना जा रहा है।


फिलहाल सभी की निगाहें 18 जून को होने वाले विधान परिषद चुनाव और उसके बाद सामने आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हैं। यह चुनाव जहां विपक्ष और सत्ता पक्ष के लिए अहम है, वहीं एनडीए के भीतर भी प्रभाव, हिस्सेदारी और राजनीतिक भविष्य को लेकर कई सवालों के जवाब इसी चुनाव के बाद। स्पष्ट हो सकते हैं।