BIHAR NEWS : होली के जश्न के बाद बिहार के सारण (छपरा) से आई जहरीली शराब कांड की खबर ने एक बार फिर पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मशरक और पानापुर इलाके में पांच लोगों की मौत ने न सिर्फ परिवारों को उजाड़ दिया, बल्कि राज्य में लागू शराबबंदी कानून की प्रभावशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जांच में यह साफ हो चुका है कि मृतकों के पास से बरामद रसायन में मिथाइल अल्कोहल था, जो जहरीली शराब का मुख्य कारण बना। इसके बावजूद सवाल यही है कि आखिर ऐसी घातक शराब बन और बिक कैसे रही है?
एडीजी स्तर के अधिकारी ने प्रेस वार्ता में बताया कि इस मामले में 10 लोगों को नामजद किया गया, जिनमें से छह की गिरफ्तारी हो चुकी है। मुख्य आरोपी भी पुलिस मुठभेड़ के बाद पकड़ा गया। पहली नजर में यह पुलिस की सक्रियता दिखाने की कोशिश लगती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक चिंताजनक है। अगर पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क होते, तो क्या इतनी बड़ी मात्रा में स्पिरिट—पानापुर में 1050 लीटर और मशरक में 650 लीटर—बरामद होने की नौबत आती? यह खुद इस बात का सबूत है कि अवैध शराब का नेटवर्क काफी समय से सक्रिय था।
इस घटना में दो शवों का पोस्टमार्टम कराया गया, जबकि तीन का अंतिम संस्कार पहले ही कर दिया गया था। यह भी एक गंभीर पहलू है कि मौत के बाद भी कई मामलों में सही जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती, जिससे सच्चाई दब जाती है। मिथाइल अल्कोहल जैसे जहरीले रसायन का उपयोग यह दर्शाता है कि अवैध शराब बनाने वाले केवल मुनाफे के लिए लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
सरकार अक्सर आंकड़े पेश कर यह दावा करती है कि शराबबंदी के बाद कार्रवाई तेज हुई है और जब्ती में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन यह तर्क भी अपने आप में सवालों के घेरे में है। अगर हर साल शराब की बरामदगी बढ़ रही है, तो इसका मतलब यह भी है कि अवैध शराब का कारोबार उतनी ही तेजी से फैल रहा है। आखिर यह कारोबार किसकी निगरानी में फल-फूल रहा है? क्या स्थानीय स्तर पर पुलिस की मिलीभगत से इनकार किया जा सकता है?
शराबबंदी कानून का उद्देश्य समाज को नशे से मुक्त करना था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आए दिन जहरीली शराब से मौत की खबरें सामने आ रही हैं। इससे साफ है कि कानून का डर अपराधियों में नहीं है, बल्कि आम लोगों को ही इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठना लाजिमी है। बड़ी मात्रा में स्पिरिट की बरामदगी यह दिखाती है कि कार्रवाई घटना के बाद होती है, न कि पहले से रोकथाम के लिए। क्या खुफिया तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है? क्या स्थानीय पुलिस को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं होती, या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है?
इस पूरे मामले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सिर्फ कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सख्ती से पालन और ईमानदारी से निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। जब तक प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे रुकने वाले नहीं हैं।
सारण की यह घटना कोई पहली नहीं है और दुर्भाग्य से अगर सिस्टम में सुधार नहीं हुआ, तो आखिरी भी नहीं होगी। जरूरत है कि सरकार आंकड़ों की बजाय जमीनी सच्चाई पर ध्यान दे और यह सुनिश्चित करे कि शराबबंदी कानून सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए, बल्कि वास्तव में लोगों की जिंदगी बचाने का माध्यम बने।






