1st Bihar Published by: First Bihar Updated Apr 12, 2026, 8:22:48 AM
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Bihar News : सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के लिए अब प्रशासन ने कमर कस ली है। पहले जहां स्कूलों का निरीक्षण थोड़ा ढीला-ढाला माना जाता था, अब उसे पूरी तरह सख्त कर दिया गया है। नए नियम के मुताबिक, जो भी अधिकारी सरकारी स्कूलों का निरीक्षण करते हैं, उन्हें अब हर कामकाजी दिन में कम से कम तीन स्कूलों का दौरा करना अनिवार्य होगा। यानी अब सिर्फ कागजों में काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर जाकर हकीकत देखनी होगी।
पहले कई बार ऐसा होता था कि निरीक्षण सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता था। अधिकारी स्कूल पहुंचते थे, थोड़ी बहुत जानकारी ली और फिर वापस लौट जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा। प्रशासन चाहता है कि अधिकारी स्कूलों में समय बिताएं, वहां की असली स्थिति समझें और बच्चों से सीधे बातचीत करें। इससे यह पता चल सकेगा कि पढ़ाई सही तरीके से हो रही है या नहीं, बच्चों को किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और स्कूल में क्या-क्या कमी है।
नए निर्देश के अनुसार, हर दिन जिले के कम से कम दो निरीक्षण अधिकारी स्कूलों का दौरा करेंगे। इससे ज्यादा से ज्यादा स्कूलों की निगरानी हो सकेगी। अधिकारियों को साफ तौर पर कहा गया है कि वे सिर्फ रजिस्टर चेक करके न निकलें, बल्कि कक्षा में जाएं, बच्चों से सवाल पूछें। जैसे – पढ़ाई समझ में आ रही है या नहीं, कौन सा विषय मुश्किल लगता है, टीचर ठीक से पढ़ाते हैं या नहीं, और स्कूल में उन्हें कोई परेशानी तो नहीं हो रही।
इसका मकसद साफ है – बच्चों की असली समस्याएं सामने लाना। कई बार बच्चे अपनी दिक्कतें खुलकर नहीं बता पाते, लेकिन जब अधिकारी सीधे उनसे बात करेंगे, तो सच्चाई सामने आएगी। इससे पढ़ाई का स्तर सुधारने में मदद मिलेगी।
डीपीओ कृतिका वर्मा ने साफ निर्देश दिया है कि सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, अपर जिला कार्यक्रम समन्वयक और सहायक कार्यक्रम पदाधिकारी रोजाना कम से कम तीन स्कूलों का निरीक्षण करें। यानी अब कोई भी अधिकारी बहाना नहीं बना सकता। अगर लापरवाही हुई तो कार्रवाई भी तय मानी जा रही है।
अगर किसी स्कूल को लेकर पहले से शिकायत आई है, खासकर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के जरिए, तो उस स्कूल को सबसे पहले जांचा जाएगा। यानी जिन स्कूलों में गड़बड़ी की खबर है, वहां अधिकारियों का फोकस ज्यादा रहेगा। इससे समस्याओं को जल्दी पकड़ा जा सकेगा और उनका समाधान भी जल्दी होगा।
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को एक तय फॉर्मेट में रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इसमें उन्हें विस्तार से लिखना होगा कि स्कूल की हालत कैसी है, क्या कमी है और क्या सुधार किया जा सकता है। सिर्फ समस्या बताना ही नहीं, बल्कि उसका समाधान भी सुझाना होगा। इससे काम ज्यादा व्यवस्थित और असरदार होगा।
मिड-डे मील यानी मध्यान भोजन की भी खास जांच होगी। अधिकारी यह देखेंगे कि बच्चों को सही समय पर खाना मिल रहा है या नहीं, खाना पर्याप्त मात्रा में है या नहीं और कितने बच्चों ने खाना खाया। कई बार खाने में गड़बड़ी की शिकायतें आती हैं, इसलिए इस पर खास ध्यान दिया जाएगा।
इसके साथ ही स्कूल के रिकॉर्ड की भी जांच होगी। यह देखा जाएगा कि प्रधानाध्यापक के साथ-साथ बाकी शिक्षकों के भी हस्ताक्षर मौजूद हैं या नहीं। इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और किसी तरह की हेराफेरी की गुंजाइश कम होगी।
अगर निरीक्षण के दौरान कोई बड़ी समस्या सामने आती है, जिसे स्कूल या स्थानीय स्तर पर ठीक करना मुश्किल है, तो उसे तुरंत ऊपर के अधिकारियों को बताया जाएगा। ताकि समय रहते उस समस्या का समाधान हो सके और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
कुल मिलाकर, सरकार का मकसद साफ है – सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को बेहतर बनाना। वह चाहती है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, स्कूलों में अनुशासन बना रहे और हर छोटी-बड़ी कमी को जल्दी से जल्दी दूर किया जाए। अब देखने वाली बात यह होगी कि ये सख्त नियम जमीन पर कितना असर दिखाते हैं और क्या सच में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदल पाती है या नहीं।