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Bihar MLC Election : बिहार MLC चुनाव का आगाज: 9 सीटों पर NDA की मजबूत पकड़, 10वां उम्मीदवार उतरा तो बदल सकता है पूरा खेल

बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के चुनाव के लिए नामांकन शुरू। विधानसभा के मौजूदा गणित में NDA को 8 और महागठबंधन को 1 सीट मिलने की संभावना। जानिए पूरा चुनावी समीकरण।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jun 01, 2026, 2:54:09 PM

Bihar MLC Election : बिहार MLC चुनाव का आगाज: 9 सीटों पर NDA की मजबूत पकड़, 10वां उम्मीदवार उतरा तो बदल सकता है पूरा खेल

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Bihar MLC Election : बिहार विधान परिषद की 10 खाली सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया रविवार से शुरू हो गई है। इनमें से 9 सीटों पर छह साल के पूर्ण कार्यकाल के लिए चुनाव होगा, जबकि एक सीट पर उपचुनाव कराया जाएगा। यह उपचुनाव पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के विधान परिषद छोड़ने से खाली हुई सीट पर होगा, जिसका कार्यकाल अभी चार वर्ष शेष है।


विधान परिषद की ये सभी सीटें विधानसभा कोटे की हैं, यानी इन पर चुनाव विधायक करते हैं। ऐसे में विधानसभा की मौजूदा संख्या और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर चुनावी तस्वीर काफी हद तक साफ दिखाई दे रही है। फिलहाल आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) आसानी से 8 सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है, जबकि महागठबंधन के खाते में 1 सीट जाना लगभग तय माना जा रहा है।


किन सीटों पर हो रहा है चुनाव

जिन 9 सीटों पर नियमित चुनाव हो रहा है, उनमें जदयू के श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, गुलाम गौस, भीष्म सहनी और कुमुद वर्मा, भाजपा के सम्राट चौधरी और संजय मयूख, राजद के सुनील कुमार सिंह और मोहम्मद फारूक तथा कांग्रेस के समीर कुमार सिंह की सीटें शामिल हैं। इनका कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है या हाल के इस्तीफों के कारण सीटें खाली हुई हैं।


वहीं नीतीश कुमार की सीट पर उपचुनाव होगा। माना जा रहा है कि इस सीट पर जदयू का ही कोई नेता उम्मीदवार बनेगा। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को लेकर भी चर्चाएं हैं, लेकिन चूंकि इस सीट का कार्यकाल केवल चार साल बचा है, इसलिए पार्टी कोई अन्य नाम भी सामने ला सकती है।


कैसे तय होगा जीत का गणित?

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में यदि सभी विधायक मतदान करते हैं तो विधान परिषद की 9 सीटों के लिए जीत का कोटा निर्धारित होगा। चुनाव प्रणाली के अनुसार कुल वोट मूल्य को सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है और फिर उसमें एक जोड़ा जाता है।


इस हिसाब से 243 विधायकों के मतदान की स्थिति में एक उम्मीदवार को जीत के लिए 2431 वोट मूल्य की आवश्यकता होगी। चूंकि प्रत्येक विधायक के प्रथम वरीयता मत का मूल्य 100 होता है, इसलिए किसी उम्मीदवार को जीत के लिए लगभग 25 विधायकों का समर्थन चाहिए।


NDA के पास 8 सीटों का स्पष्ट रास्ता

विधानसभा में भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), हम और रालोमो सहित NDA के कुल 202 विधायक हैं। इस संख्या के आधार पर गठबंधन पहली वरीयता के मतों से आसानी से 8 उम्मीदवारों को विजयी बना सकता है। दूसरी ओर विपक्षी महागठबंधन के पास राजद, कांग्रेस, माले, सीपीएम और अन्य सहयोगियों को मिलाकर 35 विधायक हैं। इसके अलावा AIMIM के 5 और बसपा का 1 विधायक विपक्षी खेमे में माना जाता है। कुल मिलाकर विपक्ष के पास 41 विधायक हैं, जो पहली वरीयता के मतों से एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त हैं। इस तरह मौजूदा समीकरण में 9 सीटों का परिणाम 8-1 के अनुपात में NDA और महागठबंधन के पक्ष में जाता दिखाई देता है।


दूसरी वरीयता के वोट क्यों हैं अहम?

विधान परिषद चुनाव में केवल पहली वरीयता के मत ही निर्णायक नहीं होते। यदि सभी सीटों का फैसला पहले दौर में नहीं हो पाता है तो विजयी उम्मीदवारों के अतिरिक्त वोटों को दूसरी वरीयता के आधार पर स्थानांतरित किया जाता है।इस प्रक्रिया का उदाहरण हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में देखने को मिला था। उस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिवेश राम पहली वरीयता के मतों से जीत के कोटे तक नहीं पहुंच पाए थे। लेकिन NDA विधायकों द्वारा दी गई दूसरी वरीयता के वोटों के स्थानांतरण से वह अंततः विजयी हो गए थे। यही वजह है कि विधान परिषद चुनाव में भी उम्मीदवारों की जीत-हार केवल पहली पसंद के वोटों पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि दूसरी और तीसरी वरीयता के मत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


10वां उम्मीदवार बना सकता है मुकाबला रोचक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि केवल 9 उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं तो परिणाम लगभग तय हैं। NDA को 8 और विपक्ष को 1 सीट मिलना तय माना जा रहा है। हालांकि यदि किसी पक्ष ने रणनीतिक तौर पर 10वां उम्मीदवार मैदान में उतार दिया तो चुनाव रोचक हो सकता है। ऐसी स्थिति में दूसरी वरीयता के वोट, क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थित विधायकों की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी। फिलहाल विधानसभा के मौजूदा गणित को देखते हुए सत्ता पक्ष के पास अतिरिक्त केवल 2 वोट हैं, जबकि विपक्ष के पास 16 अतिरिक्त वोट मौजूद हैं। इसलिए बिना बड़े राजनीतिक उलटफेर या क्रॉस वोटिंग के किसी भी पक्ष के लिए अतिरिक्त सीट निकालना आसान नहीं होगा।


यही कारण है कि बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 में सबकी नजरें उम्मीदवारों की घोषणा और संभावित 10वें उम्मीदवार पर टिकी हुई हैं। अगर मुकाबला केवल 9 सीटों तक सीमित रहा तो तस्वीर लगभग साफ है, लेकिन अतिरिक्त उम्मीदवार उतरते ही बिहार की राजनीति में नया खेल शुरू हो सकता है।