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Bihar reservation history : बजट सत्र में आरक्षण पर फिर बहस, जानिए बिहार में पहली बार कब लागू हुई थी अपनी आरक्षण नीति

बिहार विधानसभा में बजट सत्र के दौरान आरक्षण पर बहस तेज है। जानिए 1978 में कर्पूरी ठाकुर सरकार द्वारा लागू 26% आरक्षण नीति और उसका पूरा इतिहास।

 Bihar reservation history : बजट सत्र में आरक्षण पर फिर बहस, जानिए बिहार में पहली बार कब लागू हुई थी अपनी आरक्षण नीति
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Bihar reservation history : पटना स्थित बिहार विधानसभा के बजट सत्र में इन दिनों आरक्षण का मुद्दा प्रमुखता से उठ रहा है। बिहार सरकार द्वारा करवाई गई जातीय जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की सीमा और स्वरूप को लेकर नई बहस छिड़ी है। इसी क्रम में राज्य की पहली व्यापक आरक्षण नीति—1978 का निर्णय—एक बार फिर चर्चा में है।


1978: जब बना राज्य का अपना आरक्षण मॉडल

वर्ष 1978 में बिहार की तत्कालीन सरकार ने सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। उस समय मुख्यमंत्री थे कर्पूरी ठाकुर। यह नीति बाद में “कर्पूरी फार्मूला” के नाम से जानी गई। इस मॉडल की विशेषता थी कि इसमें पिछड़े वर्गों के भीतर भी उप-वर्गीकरण किया गया था। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों और समकालीन रिपोर्टों के अनुसार आरक्षण का ढांचा broadly इस प्रकार था:


12 प्रतिशत — अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC)

8 प्रतिशत — अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)

3 प्रतिशत — पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए

3 प्रतिशत — आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य (सवर्ण) वर्ग के लिए

यानी कुल 26 प्रतिशत आरक्षण को चार हिस्सों में विभाजित किया गया था। उस समय यह व्यवस्था देश के अन्य राज्यों की तुलना में अलग और विस्तृत मानी गई।


आधिकारिक आधार क्या था?

यह नीति मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों पर आधारित बताई जाती है। आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर वर्गीकरण का सुझाव दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव रखकर इसे लागू किया। हालांकि 1978 का मूल गजट नोटिफिकेशन सार्वजनिक डिजिटल रिकॉर्ड में आसानी से उपलब्ध नहीं है, लेकिन समकालीन सरकारी दस्तावेज़ों, राजनीतिक विश्लेषणों और इतिहास संबंधी प्रकाशनों में 26 प्रतिशत के इसी विभाजन का उल्लेख मिलता है।


सदन में हुई थी लंबी बहस

जब यह प्रस्ताव बिहार विधानसभा में लाया गया, तो कई दिनों तक चर्चा चली। आरक्षण के दायरे, वर्गीकरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर विस्तार से विचार हुआ। अंततः नीति को लागू किया गया और बिहार ने अपने स्तर पर एक संरचित आरक्षण मॉडल अपनाया। इस फैसले का राजनीतिक और सामाजिक असर दूरगामी रहा। आने वाले दशकों में राज्य की राजनीति में सामाजिक न्याय का प्रश्न प्रमुख मुद्दा बना रहा।


आज के संदर्भ में 1978 की प्रासंगिकता

वर्तमान बजट सत्र में जब जातीय जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग उठ रही है, तब 1978 की नीति का इतिहास स्वाभाविक रूप से चर्चा में है। यह दिखाता है कि बिहार में आरक्षण पर विमर्श कई दशकों पुराना है और समय-समय पर सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप इसकी समीक्षा होती रही है। 1978 का मॉडल इस मायने में महत्वपूर्ण था कि उसने प्रतिशत और वर्गीकरण को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया। 26 प्रतिशत का कुल आंकड़ा और उसका विभाजन आज भी राजनीतिक विमर्श में संदर्भ के रूप में लिया जाता है।


बिहार में आरक्षण की बहस का इतिहास लंबा और विस्तृत है। 1978 में लागू 26 प्रतिशत आरक्षण नीति ने राज्य को एक विशिष्ट मॉडल दिया, जिसमें विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिशत निर्धारित किए गए। आज जब नए आंकड़ों के आधार पर आरक्षण के स्वरूप पर चर्चा हो रही है, तब यह ऐतिहासिक निर्णय फिर से याद किया जा रहा है।आंकड़े अपने आप में एक कहानी कहते हैं—और 1978 का 26 प्रतिशत आरक्षण उसी कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय है।

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Tejpratap

रिपोर्टर / लेखक

Tejpratap

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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