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Bihar Politcis: क्या बिहार में भी चलेगा ‘योगी मॉडल’, BJP को गृह विभाग मिलते ही क्यों होने लगी बुलडोजर की चर्चा तेज?

Bihar Politcis: नीतीश सरकार में मंत्रियों के विभागों के बंटवारे के साथ ही शुक्रवार को बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। 2005 से लगातार गृह विभाग अपने पास रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहली बार यह...

Bihar Politcis
बिहार की राजनीतिक
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PRIYA DWIVEDI
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Bihar Politcis: नीतीश सरकार में मंत्रियों के विभागों के बंटवारे के साथ ही शुक्रवार को बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। 2005 से लगातार गृह विभाग अपने पास रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहली बार यह शक्तिशाली मंत्रालय छोड़ दिया है। ताजा दायित्व बंटवारे में गृह विभाग भाजपा विधायक दल के नेता और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी संभालेंगे। 89 सीटें जीतने वाली भाजपा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी 85 सीटों वाली जदयू को सौंपकर गठबंधन में संतुलन दिखाया, लेकिन गृह विभाग देकर भाजपा के प्रति यह सिर्फ नीतीश की उदारता है, भाजपा का दबाव है, या भविष्य की राजनीति का संकेत—इस पर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज है।


2005 में लालू-राबड़ी शासन को हटाकर नीतीश कुमार सत्ता में आए। इसके बाद से उन्होंने गृह विभाग कभी हाथ से जाने नहीं दिया। जंगलराज की छाया मिटाकर कानून व्यवस्था मजबूत करना उनका सबसे बड़ा चुनावी व प्रशासनिक एजेंडा था। नीतीश सरकार ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए, अपराधियों पर इस दौर में ‘सुशासन बाबू’ की छवि मजबूत हुई। दो दशकों में कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और अपराध पर सख्ती जारी रही। यही वजह थी कि गृह विभाग को नीतीश का सबसे सुरक्षित और रणनीतिक मंत्रालय माना जाता था। अब वही विभाग सम्राट चौधरी के पास जाने से राजनीतिक संकेत साफ है कि बिहार की सत्ता समीकरणों में गहरा बदलाव हो चुका है।


भाजपा पिछले कुछ समय से गृह विभाग की मांग कर रही थी। महाराष्ट्र, हरियाणा और अन्य राज्यों की तरह भाजपा चाहती थी कि कानून व्यवस्था जैसे अहम मंत्रालय उसके नियंत्रण में रहे। यह सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी है, भाजपा कानून व्यवस्था के मुद्दे पर अपनी सख्त छवि को मजबूत करना चाहती है और आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति में अपनी स्थिति को और स्थायी बनाना चाहती है।


2025 के चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा नेतृत्व चाहता था कि गठबंधन में उसकी राजनीतिक ताकत के अनुरूप प्रभाव दिखाई दे। गृह विभाग उसी का प्रतीक है। नीतीश के कई बार गठबंधन बदलने के बाद भाजपा एक स्थायी और मजबूत नियंत्रण चाहती थी। गृह विभाग देना गठबंधन को मजबूती देने की एक शर्त जैसा था। 73 साल के नीतीश अब ‘मैनेजमेंट और मॉनिटरिंग’ मॉडल पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं, जहां प्रमुख विभाग उनके पास रहें लेकिन परिचालन जिम्मेदारियां सहयोगियों पर हों।


अंतिम कार्यकाल में अपराध बढ़ने और विपक्ष की आलोचनाओं के कारण कानून व्यवस्था BJP की प्राथमिकता बन गई। BJP अब इसे सीधे अपने एजेंडा के अनुसार चलाना चाहती है। गृह विभाग BJP को मिलते ही पार्टी नेताओं में उत्साह दिखा। कई नेताओं ने यूपी की तर्ज पर सख्त कार्रवाई और बुलडोजर नीति की संभावनाएं जताई हैं।

अब चुनौती यह है कि सम्राट चौधरी नीतीश के मॉडल और भाजपा की सख्त छवि—दोनों के बीच कैसे संतुलन बैठाते हैं।


बिहार में ऐसा सिर्फ तीन बार हुआ है

1967: महामाया प्रसाद सिन्हा सरकार में गृह विभाग रामानंद तिवारी के पास।

1971: कर्पूरी ठाकुर सरकार में भी गृह तिवारी के पास।

1974: अब्दुल गफूर सरकार में गृहमंत्री खुद CM गफूर, लेकिन गृह राज्यमंत्री राधानंदन झा थे।

2025 में नीतीश कुमार द्वारा गृह विभाग छोड़ना राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है।

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रिपोर्टर / लेखक

PRIYA DWIVEDI

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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