देश में महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू विधवा महिलाएं कुछ खास शर्तों के तहत अपने ससुर से भी गुजारा भत्ता मांग सकती हैं। यह फैसला न सिर्फ कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी काफी मायने रखता है।
क्या कहा हाई कोर्ट ने?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति की जिम्मेदारी होती है और यह जिम्मेदारी केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहती। यदि पति की मृत्यु हो जाती है, तो भी यह दायित्व पूरी तरह समाप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में विधवा महिला को अपने ससुर से भरण-पोषण की मांग करने का अधिकार मिल सकता है।
इस फैसले को हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत दिए गए प्रावधानों के आधार पर समझाया गया है।
किन धाराओं के तहत मिला अधिकार?
कोर्ट ने खासतौर पर इस अधिनियम की धारा 19 और 21 का हवाला दिया। इन धाराओं में यह प्रावधान है कि एक विधवा बहू कुछ परिस्थितियों में अपने ससुर या उनकी संपत्ति से गुजारा भत्ता मांग सकती है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की पीठ ने की, जिन्होंने अपने फैसले में विस्तार से इन अधिकारों को स्पष्ट किया।
हर स्थिति में नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह अधिकार हर विधवा महिला को स्वतः नहीं मिल जाता। इसके लिए कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं। सबसे पहली शर्त यह है कि महिला खुद अपने खर्च चलाने में सक्षम न हो। यानी अगर उसके पास खुद की आय या पर्याप्त संपत्ति है, तो वह ससुर से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।
पहले इन स्रोतों को खंगालना होगा
कोर्ट ने यह भी कहा कि विधवा महिला को पहले यह देखना होगा कि क्या वह अपने पति की संपत्ति, माता-पिता की मदद या बच्चों के सहारे अपना गुजारा कर सकती है या नहीं। अगर इन सभी स्रोतों से उसे कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती, तभी वह अपने ससुर से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार होगी।
ससुर की क्षमता भी है जरूरी
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ससुर के पास भी पर्याप्त संसाधन होने चाहिए। अगर ससुर खुद आर्थिक रूप से कमजोर हैं या उनके पास ऐसी संपत्ति नहीं है जिससे वे बहू का खर्च उठा सकें, तो उन पर यह जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
पुनर्विवाह के बाद खत्म होगा अधिकार
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विधवा महिला दोबारा शादी कर लेती है, तो उसके बाद ससुर से गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाएगा।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, यह फैसला एक ऐसे मामले में आया, जिसमें पति ने अपनी पत्नी पर झूठे बयान देने का आरोप लगाया था। पति का कहना था कि उसकी पत्नी ने खुद को बेरोजगार बताया, जबकि उसके पास बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में अच्छी-खासी रकम मौजूद थी।
कोर्ट ने इस पर कहा कि केवल संपत्ति होना यह साबित नहीं करता कि महिला की नियमित आय है। साथ ही यह भी कहा गया कि यह साबित करने की जिम्मेदारी पति की थी कि उसकी पत्नी नौकरी कर रही है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका।
पिता की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी
कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि शादी के बाद किसी पिता की यह जिम्मेदारी नहीं होती कि वह अपनी बेटी का भरण-पोषण करे, जब तक कि वह विधवा न हो जाए।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला उन महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है, जो पति की मृत्यु के बाद आर्थिक रूप से असहाय हो जाती हैं। इससे उन्हें एक अतिरिक्त कानूनी सहारा मिलता है, जिससे वे अपने जीवनयापन के लिए संघर्ष कर सकें। हालांकि, कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इस अधिकार का इस्तेमाल केवल उन्हीं परिस्थितियों में किया जा सकता है, जहां महिला वास्तव में जरूरतमंद हो।






