Bihar Politics Analysis : बिहार चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल की बुरी हार चर्चा में है। इस करारी शिकस्त के बाद अब पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी ने राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर हमला किया है। कभी लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, बिहार का यह चुनाव कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है।
बिहार का यह विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ है। यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगियों के साथ पूर्ण बहुमत की दहलीज़ तक पहुँचती दिखाई दे रही है। हालांकि सत्ता संचालन की निरंतरता के लिए कुछ समय तक मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार ही बने रहेंगे, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि बिहार में “अपनी सरकार” बनाने का भाजपा का दशकभर पुराना सपना लगभग पूरा होने को है। संपूर्ण हिंदी पट्टी में बिहार ही वह आखिरी प्रदेश था जहाँ भाजपा अब तक स्वतंत्र नेतृत्व में सत्ता स्थापित नहीं कर पाई थी।
बिहार, जो बुद्ध की धरती है, जहां चंपारण से गांधी का सत्याग्रह देशव्यापी हुआ, लोहिया और जयप्रकाश के संघर्षों का केंद्र रहा—उसने लंबे समय तक किसी एक विचारधारा को अपना एकाधिकार नहीं दिया। भाजपा का भी यहाँ राजनीतिक आधार हमेशा अन्य दलों से आए नेताओं पर टिके रहने के आरोपों से घिरा रहा। इसके बावजूद आज प्रदेश की सत्ता के मुख्य केंद्र में भाजपा की उपस्थिति एक नए राजनीतिक युग की ओर इशारा कर रही है।
लालू यादव की राजनीति का ढलान
इस चुनाव ने सबसे बड़ा असर लालू प्रसाद यादव की राजनीति पर छोड़ा है। यह परिणाम साफ संकेत देता है कि लालू युग अब समाप्ति की ओर है। तेजस्वी यादव भले ही पार्टी के औपचारिक नेता हों, पर राजनीतिक व्यक्तित्व और निर्णय क्षमता के स्तर पर वे अभी भी लालू यादव की छाया ही माने जाते हैं।
लालू यादव की राजनीति का कमजोर पड़ना कोई अचानक घटना नहीं है। वर्ष 2010 में ही लालू यादव की पार्टी को विधानसभा में मात्र 22 सीटें मिली थीं—इतनी कम कि पार्टी मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी न ले सकी। जबकि एक दौर में वही लालू यादव भागलपुर दंगे के बाद कांग्रेस की गिरी हुई साख के बीच सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के बड़े वाहक बनकर उभरे थे।
1990 में जनता दल के भीतर नेतृत्व संकट के दौरान जब वीपी सिंह रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, तब नीतीश कुमार और शरद यादव के दबाव में विधायक दल में चुनाव हुआ और लालू यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने। यह वही दौर था जब मंडल आयोग के समर्थन और आडवाणी की रथयात्रा को रोककर उन्होंने खुद को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर लिया था।
लेकिन लालू यादव इस शक्ति का उपयोग सामाजिक न्याय और कमजोर जातियों के सशक्तिकरण के लिए दीर्घकालिक संस्थागत ढांचे तैयार करने में असफल रहे। राजनीति धीरे–धीरे परिवारवाद में सिमटती चली गई।
नीतीश कुमार: सीमित जोखिम, लेकिन गहरा असर
दूसरी ओर नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में जोखिम कम उठाए, पर सामाजिक न्याय के कार्यक्रमों ने बिहार समाज में व्यापक बदलाव लाए—खासकर महिलाओं और पिछड़ी–कमजोर जातियों में। यही कारण है कि उनकी राजनीति का प्रभाव आज भी कायम है।
2015 में मोदी के चेहरे से असहमत होकर वे लालू के साथ गए और महागठबंधन बनाकर भाजपा को सत्ता से दूर कर दिया। नीतीश और लालू दोनों 101–101 सीटों पर लड़े, कांग्रेस 43 सीटों पर। इस चुनाव में लालू की पार्टी 80 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी।
लेकिन नीतीश कुमार के अनुसार कई सीटों पर राजद ने जानबूझकर जदयू उम्मीदवारों को हरवाया—यही अविश्वास बाद में गठबंधन टूटने का कारण बना। नीतीश की राजनीति का चक्र लगातार एनडीए–महागठबंधन के बीच घूमता रहा, जब तक कि भाजपा–जदयू फिर एक साथ नहीं आ गए।
ताज़ा चुनाव का सन्देश
पिछले चुनाव में जदयू 43 से बढ़कर 85 सीटों तक पहुँची, जबकि भाजपा 74 से केवल 89 तक पहुँची—यानी बढ़त के बावजूद भाजपा वास्तविक रूप से उतनी मजबूत नहीं हुई, जितना आंकड़ों में दिखता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि भाजपा नीतीश पर “कृपा” कर रही है—क्योंकि सत्ता समीकरणों में नीतीश अभी भी निर्णायक केंद्र हैं।
नीतीश के बाद क्या?
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि नीतीश कुमार के बाद जदयू समर्थक किसके नेतृत्व में जाएंगे? नीतीश ने अपना कोई राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं बनाया है। लालू यादव के यहां उनका जाना संभव नहीं। ऐसे में स्वाभाविक है कि बड़ा वर्ग भाजपा की विचारधारा में शामिल हो सकता है, जिससे बिहार में हिंदुत्व राजनीति का एकक्षत्र वर्चस्व स्थापित हो जाएगा।
नीतीश खुद को गांधी का अनुयायी बताते हैं, जबकि भाजपा में गांधी की आलोचना करने वाली विचारधारा को सम्मान मिलता है। ऐसे में यह भी प्रश्न उठता है कि क्या नीतीश यह समझ पाए हैं कि वे किस राजनीतिक रास्ते की ओर बिहार को धकेल रहे हैं?






