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BIHAR NEWS : फेस कैप्चरिंग सिस्टम ने खोली पोल: बिहार आंगनबाड़ी में 3 साल में 25% बच्चे कम, बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर

बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों में एक बड़ा खुलासा हुआ है, जहां फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू होने के बाद बच्चों की संख्या में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे फर्जीवाड़े की परतें खुलती नजर आ रही हैं।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Apr 19, 2026, 7:44:02 AM

BIHAR NEWS : फेस कैप्चरिंग सिस्टम ने खोली पोल: बिहार आंगनबाड़ी में 3 साल में 25% बच्चे कम, बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर

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BIHAR NEWS : बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़ा एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। पिछले तीन वर्षों में राज्य के आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत 3 से 6 वर्ष की उम्र के बच्चों की संख्या में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट तब और तेजी से सामने आई जब केंद्रों पर फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू किया गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मार्च 2023 में जहां करीब 51 लाख 72 हजार बच्चे पंजीकृत थे, वहीं मार्च 2024 में यह संख्या बढ़कर 55 लाख 60 हजार 315 तक पहुंच गई थी। लेकिन इसके बाद स्थिति उलट गई और मार्च 2026 तक यह घटकर केवल 40 लाख 35 हजार 339 रह गई।


राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में आंगनबाड़ी सेवाओं को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू किया था। इस व्यवस्था के तहत आंगनबाड़ी सेविकाओं को लाभार्थी बच्चों की तस्वीरें खींचकर पोषण ट्रैकर एप पर अपलोड करनी अनिवार्य की गई। इस तकनीक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक और उपस्थित बच्चों को ही मिले।


फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू होने के बाद जैसे-जैसे सत्यापन प्रक्रिया सख्त हुई, आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जाने लगी। पहले जहां कई केंद्रों पर कागजों में बच्चों की संख्या अधिक दिखाई जाती थी, वहीं डिजिटल वेरिफिकेशन के बाद कई फर्जी और बेनामी नाम सामने आने लगे।


आईसीडीएस विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पहले कई आंगनबाड़ी केंद्रों पर सेविकाओं द्वारा वास्तविक संख्या से अधिक बच्चों का रिकॉर्ड दिखाया जाता था, ताकि पोषण सामग्री और अन्य लाभों का अधिक आवंटन प्राप्त किया जा सके। लेकिन फेस कैप्चरिंग और आधार लिंकिंग प्रणाली के लागू होने के बाद ऐसे फर्जी रिकॉर्ड धीरे-धीरे उजागर होने लगे।


नई व्यवस्था के तहत हर बच्चे का आधार नंबर लिंक किया गया है और उसकी पहचान फेस रिकग्निशन तकनीक के माध्यम से की जाती है। सेविकाओं को प्रत्येक बच्चे की उपस्थिति का फोटो पोषण ट्रैकर एप पर अपलोड करना होता है, जिसके बाद ही उस बच्चे को पोषण सामग्री या अन्य सरकारी लाभ प्रदान किए जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया एक वेरिफिकेशन सिस्टम के रूप में काम करती है, जिसमें अपलोड किए गए चेहरे की तुलना पहले से मौजूद डाटाबेस से की जाती है।


अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक के लागू होने के बाद केंद्रों पर वास्तविक उपस्थिति का सही आकलन संभव हो पाया है। वहीं, जिन स्थानों पर पहले कागजों पर अधिक संख्या दिखाई जाती थी, वहां अब वास्तविक बच्चों की संख्या सामने आने लगी है। इसी कारण कुल पंजीकृत बच्चों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।


हालांकि, इस बदलाव को लेकर कुछ स्तर पर चर्चा भी शुरू हो गई है। एक ओर जहां इसे पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर रोक के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इससे पहले के वर्षों में योजनाओं का लाभ सही तरीके से वितरित हो रहा था या नहीं।


आईसीडीएस विभाग के अनुसार, फेस कैप्चरिंग सिस्टम का मुख्य उद्देश्य फर्जीवाड़े को खत्म करना और वास्तविक लाभार्थियों तक योजनाओं को पहुंचाना है। विभाग का मानना है कि आने वाले समय में इस तकनीक के जरिए न केवल डेटा अधिक सटीक होगा, बल्कि योजनाओं की प्रभावशीलता भी बढ़ेगी। फिलहाल, आंकड़ों में आई यह गिरावट प्रशासनिक सख्ती और डिजिटल निगरानी का परिणाम मानी जा रही है, जिसने आंगनबाड़ी व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही अनियमितताओं को उजागर कर दिया है।