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Nitish Kumar : नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर: निर्दलीय विधायक से 10 बार बने बिहार के मुख्यमंत्री, अब राज्यसभा की तैयारी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा के बीच जानिए उनका पूरा राजनीतिक सफर—1985 में निर्दलीय विधायक से लेकर 10 बार मुख्यमंत्री बनने तक की कहानी।

Nitish Kumar
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Nitish Kumar : बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव की ओर बढ़ती नजर आ रही है। सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जानकारी के मुताबिक, नीतीश कुमार आज सुबह 11:30 बजे राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर सकते हैं। ऐसे में उनके लंबे और उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर पर नजर डालना बेहद जरूरी हो जाता है।


नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण रहा है। उन्होंने साल 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा में कदम रखा। इसके बाद 1987 में उन्हें युवा लोक दल का अध्यक्ष बनाया गया, जिससे उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत होने लगी। साल 1989 में वे बिहार में जनता दल के महासचिव बने और इसी वर्ष नौवीं लोकसभा के लिए भी चुने गए।


लोकसभा में अपने पहले कार्यकाल के दौरान नीतीश कुमार ने केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई। उनकी कार्यशैली और संगठनात्मक क्षमता के कारण 1991 में वे दोबारा लोकसभा के लिए चुने गए और राष्ट्रीय स्तर पर महासचिव की जिम्मेदारी भी मिली।


साल 1994 में उन्होंने वरिष्ठ समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी की स्थापना की। यह उनके राजनीतिक करियर का अहम मोड़ था। 1996 में वे फिर लोकसभा पहुंचे और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री बने। इस दौरान उन्होंने रेल मंत्रालय सहित कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाली और एक कुशल प्रशासक के रूप में पहचान बनाई।


नीतीश कुमार 1989 से 2004 तक लगातार बाढ़ लोकसभा सीट से चुनाव जीतते रहे। इससे उनकी जनाधार और राजनीतिक पकड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है। 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार में वे पहली बार कृषि राज्यमंत्री बने। इसके बाद 2001 से 2004 के बीच उन्होंने रेल मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।


बिहार की राजनीति में उनका सबसे बड़ा अध्याय मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुआ। पहली बार उन्होंने मार्च 2000 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, हालांकि बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार सिर्फ 7 दिन ही चल सकी। इसके बाद 24 नवंबर 2005 को उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला और बिहार में विकास की नई दिशा देने का दावा किया।


2010 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी छवि सुशासन बाबू के रूप में मजबूत हुई। हालांकि 2013 में जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया, तो नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होने का फैसला लिया। इसके बाद 2015 में उन्होंने महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा और सरकार बनाई, जिसके तहत वे पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने।


बिहार की राजनीति में “पलटी मार” की राजनीति का जिक्र अक्सर नीतीश कुमार के संदर्भ में होता है। जुलाई 2017 में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर फिर एनडीए का दामन थाम लिया और छठी बार मुख्यमंत्री बने। 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद वे सातवीं बार मुख्यमंत्री बने।


अगस्त 2022 में उन्होंने एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदला और महागठबंधन में शामिल होकर आठवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। जनवरी 2024 में उन्होंने फिर एनडीए का साथ लिया और नौवीं बार मुख्यमंत्री बने।


इसके बाद 20 नवंबर 2025 को उन्होंने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत कई बड़े नेता और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे।


अब एक बार फिर उनके राज्यसभा जाने की खबरों ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाते हैं, तो बिहार में नेतृत्व परिवर्तन तय माना जा रहा है। इससे न सिर्फ जेडीयू बल्कि बीजेपी और पूरे एनडीए के भीतर नए समीकरण बन सकते हैं।


कुल मिलाकर, नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति में एक अनोखा उदाहरण है, जहां उन्होंने समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार फैसले लिए और खुद को प्रासंगिक बनाए रखा। अब देखना दिलचस्प होगा कि उनका अगला कदम बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

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Tejpratap

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Tejpratap

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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