1st Bihar Published by: First Bihar Updated May 29, 2026, 1:49:26 PM
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Bihar News: बिहार में शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार उन दावों की पोल खोल देती है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल एजुकेशन और बेहतर स्कूलों की बातें करने वाली व्यवस्था के बीच एक ऐसा सरकारी स्कूल भी है, जहां बच्चे आज भी खुले आसमान के नीचे तिरपाल बिछाकर पढ़ने को मजबूर हैं।
मामला खगड़िया जिले के बेलदौर प्रखंड स्थित प्राथमिक विद्यालय गांधी नगर का है। यहां स्कूल भवन कोसी नदी के कटाव में तीन साल पहले बह गया था। तब से लेकर आज तक बच्चों के लिए नया भवन नहीं बन सका। मजबूरी में गांव के मुखिया के बगीचे में तिरपाल लगाकर स्कूल चलाया जा रहा है।
स्कूल में कुल 237 बच्चे नामांकित हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक तैनात हैं। अलग-अलग तिरपाल के नीचे बच्चों की कक्षाएं लगती हैं। गर्मी हो, बारिश हो या तेज हवा—इसी अस्थायी व्यवस्था के सहारे बच्चों की पढ़ाई चल रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तेज आंधी आती है तो तिरपाल उड़ जाता है। बारिश शुरू होते ही बच्चों को इधर-उधर भागकर आसपास के घरों में छिपना पड़ता है। कई बार पढ़ाई बीच में ही बंद करनी पड़ती है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि स्कूल में पिछले तीन साल से मध्याह्न भोजन यानी एमडीएम भी नहीं बन रहा है। बच्चों को टिफिन के समय घर जाकर खाना खाना पड़ता है, फिर वापस स्कूल लौटना पड़ता है।
स्कूल के प्रधानाध्यापक गोरेलाल राम बताते हैं कि अब बच्चों को इस कठिन परिस्थिति की आदत सी हो गई है। बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। पीने के लिए साफ पानी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद बच्चे रोज स्कूल पहुंच रहे हैं और पढ़ाई जारी रखे हुए हैं।
उन्होंने कहा कि कई बार विभाग को भवन निर्माण के लिए जानकारी दी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। ऐसे में शिक्षक और बच्चे दोनों संघर्ष के बीच शिक्षा की लौ जलाए हुए हैं।
बच्चों का कहना है कि उन्हें पढ़ने में बहुत दिक्कत होती है। गर्मी में तिरपाल के नीचे बैठना मुश्किल हो जाता है, जबकि बारिश के समय कॉपियां और किताबें तक भीग जाती हैं। बावजूद इसके वे पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहते।
इस पूरे मामले पर जिला शिक्षा पदाधिकारी ने कहा कि जिले में ऐसे 54 विद्यालय हैं, जिनके पास अपना भवन या जमीन नहीं है। प्राथमिक विद्यालय गांधी नगर के लिए जमीन उपलब्ध करा दी गई है और भवन निर्माण को लेकर विभागीय स्तर पर प्रक्रिया चल रही है। डीएम की ओर से शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को पत्र भी भेजा गया है।
हालांकि सवाल यह है कि आखिर तीन साल बीत जाने के बाद भी बच्चों को बुनियादी सुविधा क्यों नहीं मिल सकी? सरकार शिक्षा सुधार की बात करती है, लेकिन यहां बच्चे तिरपाल के नीचे बैठकर अपना भविष्य लिखने को मजबूर हैं।
एक तरफ मंत्री और अधिकारी छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए तुरंत कार्रवाई करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सैकड़ों बच्चों का भविष्य खुले आसमान के भरोसे छोड़ दिया गया है।