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Political News : 'सम्राट' पहले नहीं बल्कि इतने नंबर वाले नेता जिन्हें बिना BJP या RSS बैकग्राउंड के पार्टी ने बनाया 'CM', लिस्ट में इन नेताओं का नाम भी है शामिल

बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ है, जहां सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नई सियासी दिशा तय कर दी है। बीजेपी ने पहली बार अपने नेता को सीएम बनाकर स्पष्ट संकेत दिया है कि पार्टी अब नए चेहरों पर भरोसा जता रही है।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Apr 15, 2026, 1:32:55 PM

Political News : 'सम्राट' पहले नहीं बल्कि इतने नंबर वाले नेता जिन्हें बिना BJP या RSS बैकग्राउंड के पार्टी ने बनाया 'CM', लिस्ट में इन नेताओं का नाम भी है शामिल

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Political News : बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। सम्राट चौधरी अब राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके हैं और इसके साथ ही बीजेपी ने इतिहास रचते हुए पहली बार अपने किसी नेता को बिहार की सत्ता की कमान सौंपी है। बुधवार को राज्यपाल सैय्यद अता हसनैन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस शपथ ग्रहण समारोह में जेडीयू कोटे से विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने भी मंत्री पद की शपथ ली।


सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना कई मायनों में खास है। वह ऐसे नेता हैं जिनका शुरुआती राजनीतिक बैकग्राउंड न तो बीजेपी से जुड़ा रहा और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। उन्होंने अपनी सियासी यात्रा की शुरुआत 1990 के दशक में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से की थी। बाद में वह राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी बने। आरजेडी से विधायक रहने के बाद उन्होंने 2014 में जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू) का रुख किया और वहां भी मंत्री पद संभाला।


राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया। बीजेपी में आने के बाद उनका कद तेजी से बढ़ा। वह विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बने, फिर प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। पार्टी ने उन्हें ओबीसी चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे वह नीतीश कुमार के विकल्प के तौर पर स्थापित होते गए। डिप्टी सीएम बनने के बाद अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक उनका सफर पूरा हुआ।


हालांकि, सम्राट चौधरी अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें बीजेपी ने दूसरे दल से आने के बावजूद मुख्यमंत्री बनाया हो। पार्टी ने समय-समय पर ऐसे कई नेताओं को मौका दिया है, जिनकी राजनीतिक शुरुआत कांग्रेस या अन्य दलों से हुई, लेकिन बीजेपी में आने के बाद उनका कद और प्रभाव बढ़ा।


इसमें सबसे प्रमुख नाम हिमंत बिस्वा सरमा का है। उन्होंने अपनी राजनीति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से शुरू की थी और तरुण गोगोई सरकार में मंत्री रहे। लेकिन 2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए। इसके बाद 2016 में बीजेपी सरकार बनने पर मंत्री बने और 2021 में असम के मुख्यमंत्री बने। आज भी वह राज्य में बीजेपी का प्रमुख चेहरा हैं।


इसी तरह सर्बानंद सोनोवाल का सफर भी दिलचस्प रहा। उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत की और असम गण परिषद से जुड़े रहे। बाद में बीजेपी में शामिल होकर 2016 में असम के मुख्यमंत्री बने। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भी बीजेपी ने बाहरी पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर भरोसा जताया। एन बीरेन सिंह पहले कांग्रेस में थे, लेकिन 2016 में बीजेपी में शामिल हुए और 2017 में मुख्यमंत्री बने। बाद में युमनाम खेमचंद सिंह को भी पार्टी ने मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी, जिनकी शुरुआत भी किसी अन्य दल से हुई थी।


अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू का उदाहरण भी इसी कड़ी में आता है। उन्होंने कांग्रेस से राजनीति शुरू की, लेकिन 2016 में बीजेपी में शामिल हो गए और तब से लगातार मुख्यमंत्री बने हुए हैं। इससे पहले गेगोंग अपांग भी कांग्रेस से बीजेपी में आए और कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने। त्रिपुरा में माणिक साहा ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन की और 2022 में मुख्यमंत्री बने। वहीं कर्नाटक में बसवराज बोम्मई, जो पहले जनता दल से जुड़े थे, बीजेपी में आने के बाद मुख्यमंत्री बने।


इसके अलावा झारखंड में अर्जुन मुंडा का उदाहरण भी अहम है, जिन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा से शुरुआत की और बाद में बीजेपी में शामिल होकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बने। उत्तर प्रदेश में ब्रजेश पाठक भी इसी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने कांग्रेस और बसपा से होते हुए बीजेपी में एंट्री की और आज राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं।


इन सभी उदाहरणों से साफ है कि बीजेपी ने समय के साथ अपनी राजनीति को लचीला बनाया है। पार्टी अब सिर्फ वैचारिक पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रही, बल्कि ऐसे नेताओं को भी आगे बढ़ा रही है जो दूसरे दलों से आकर अपनी राजनीतिक क्षमता साबित कर चुके हैं।


सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इसी रणनीति का ताजा उदाहरण है। उनका राजनीतिक अनुभव, सामाजिक समीकरणों पर पकड़ और संगठन में बढ़ता प्रभाव उन्हें इस मुकाम तक ले आया है। अब देखना होगा कि वह बिहार की राजनीति में किस तरह अपनी छाप छोड़ते हैं और आगामी चुनावों में बीजेपी को किस दिशा में ले जाते हैं।