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World Food Day: भारत में आज भी लाखों लोग भूखे सोने को मजबूर, खाना बर्बाद करने में भी देश अव्वल

World Food Day: भारत में आज भी लाखों लोग भूखे सोते हैं। GHI 2024 में देश को 105वां स्थान, 78 मिलियन टन खाने की बर्बादी.. क्या है इसका समाधान?

World Food Day
प्रतीकात्मक
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Deepak KumarDeepak Kumar|
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World Food Day: आज विश्व खाद्य दिवस पर भूख, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा जैसे मुद्दे फिर से सुर्खियों में हैं। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा स्थापित यह दिन हमें याद दिलाता है कि वैश्विक स्तर पर प्रगति के बावजूद, करोड़ों लोग अभी भी पोषण से वंचित हैं। भारत, दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश, इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित है। 2021-2023 के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 19.46 करोड़ भारतीय (लगभग 13.7 प्रतिशत आबादी) कुपोषित हैं और अपर्याप्त आहार के कारण रात को लाखों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर भी। यह संख्या कई देशों की कुल जनसंख्या से अधिक है। FAO के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 7.33 करोड़ लोग भूख का शिकार हैं, जिसमें भारत का योगदान सबसे बड़ा है।


ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2024 में भारत 127 देशों में 105वें स्थान पर है, यह 'गंभीर' श्रेणी में आता है। भारत का GHI स्कोर 27.3 है जो 2023 के 28.7 से थोड़ा बेहतर हुआ है लेकिन दक्षिण एशियाई पड़ोसियों जैसे बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 35.5 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड (कम वजन वाले), 18.7 प्रतिशत वेस्टेड (कमजोर) और 56.4 प्रतिशत एनीमिक हैं। 2025 की शुरुआती रिपोर्ट में भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर है जो समस्या की गहराई दर्शाता है।


इस भूख के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। सबसे बड़ा है खाद्य असमानता, भारत में 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन बर्बाद हो जाता है जो लगभग 78.2 मिलियन टन (92,000 करोड़ रुपये मूल्य) के बराबर है। घरेलू स्तर पर प्रति व्यक्ति 55 किलोग्राम खाना बर्बाद होता है और यह वैश्विक औसत से अधिक है। कारणों में खराब भंडारण, परिवहन की कमी, बाजारों में अतिउत्पादन और सांस्कृतिक आदतें (जैसे अतिरिक्त खाना परोसना) शामिल हैं। महामारी ने स्थिति और भी बिगाड़ दी, जहां 2020-2022 में 23.39 करोड़ लोग कुपोषित थे। आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं।


भूख से निपटने के लिए भारत ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, मिड-डे मील योजना, आंगनवाड़ी कार्यक्रम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे कदम उठाए हैं जो लाखों को सब्सिडी वाले अनाज प्रदान करते हैं। फिर भी, वितरण में रिसाव, भ्रष्टाचार और जागरूकता की कमी चुनौतियां बनी हुई हैं। FAO का लक्ष्य 2030 तक 'जीरो हंगर' है, लेकिन वर्तमान गति से यह मुश्किल लगता है। समाधान में खाद्य दान को बढ़ावा, बर्बादी रोकथाम और सतत कृषि शामिल हैं। व्यक्तिगत स्तर पर, घरों में प्लानिंग से खरीदारी और बर्बादी रोकना महत्वपूर्ण है। भूख न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा है, जब तक यह बना रहेगा, विकास अधूरा ही रहेगा।

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रिपोर्टर / लेखक

Deepak Kumar

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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