Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मियां अब अपने चरम पर हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और अब प्रचार अभियान को धार दी जा रही है। एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) ने भी अपने सभी घटक दलों जेडीयू, भाजपा, हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा), लोजपा (राम विलास) और आरएलएम (राष्ट्रीय लोक जनता मंच) की उम्मीदवार सूची जारी कर दी है। हालांकि, इस बार एनडीए में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बेहद सीमित दिख रहा है।
एनडीए की सहयोगी जेडीयू को छोड़कर किसी भी दल ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। जेडीयू ने अपनी सूची में मात्र चार मुस्लिम प्रत्याशी शामिल किए हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बिहार की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत है। जेडीयू ने अपने चार मुस्लिम उम्मीदवारों के जरिये एनडीए के भीतर संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
पार्टी की पहली सूची बुधवार को जारी हुई थी, जिसमें 57 उम्मीदवारों के नाम थे। गुरुवार को दूसरी सूची जारी करते हुए बचे हुए 44 नामों का भी ऐलान किया गया। वहीं, भाजपा ने 101 उम्मीदवारों की घोषणा तीन चरणों में, हम ने 6 उम्मीदवारों की सूची, और लोजपा (राम विलास) ने 14 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम ने भी अपने हिस्से की सीटों पर नाम तय कर दिए हैं।
जेडीयू का यह कदम भाजपा के साथ उसके गठबंधन को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा है। 2020 के चुनाव में जेडीयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी जीत नहीं पाया था। बसपा छोड़कर आए जमा खान को नीतीश कुमार ने मंत्री बनाकर मुस्लिम समुदाय में संदेश देने की कोशिश की थी।
जेडीयू के इतिहास पर नजर डालें तो नीतीश कुमार ने हमेशा सामाजिक और धार्मिक संतुलन को प्राथमिकता दी है। 2005 में पार्टी ने 9 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, 2010 में यह संख्या 17 थी, जबकि 2015 में 7 मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका दिया गया था। उस समय जेडीयू राजद के साथ गठबंधन में थी। लेकिन भाजपा के साथ आने के बाद मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा पार्टी से लगातार कम होता गया।
2020 के विधानसभा चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि मुस्लिम समुदाय ने जेडीयू से दूरी बना ली है। पार्टी के सभी मुस्लिम उम्मीदवार हार गए, जिससे यह संकेत मिला कि भाजपा के साथ गठबंधन का असर नीतीश कुमार की मुस्लिम छवि पर पड़ा है। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनावों में भी यही रुझान देखने को मिला, जब जेडीयू नेताओं देवेश चंद्र ठाकुर और ललन सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें मुसलमानों के वोट नहीं मिले।
नीतीश कुमार ने मुस्लिम समुदाय के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाईं चाहे वह अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना हो, मदरसा सुधार कार्यक्रम या पिछड़े मुस्लिम तबकों के उत्थान की नीतियां। इसके बावजूद, भाजपा की नीतियों और उसके साथ लंबे गठबंधन की वजह से मुस्लिम मतदाताओं में नाराजगी बनी रही।
हाल ही में वक्फ कानून पर भाजपा के समर्थन में जेडीयू का रुख भी मुस्लिम समाज को नागवार गुजरा था। इतना ही नहीं, रमजान के दौरान आयोजित जेडीयू के इफ्तार समारोह में मुस्लिम समुदाय ने बायकाट कर दिया था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यही कारण है कि इस बार जेडीयू ने केवल चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का निर्णय लिया, ताकि पार्टी को नुकसान भी न हो और गठबंधन की छवि भी बची रहे।
जेडीयू की रणनीति इस बार साफ है जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के संतुलन के साथ चुनाव मैदान में उतरना। नीतीश कुमार जानते हैं कि मुस्लिम-यादव समीकरण महागठबंधन का स्थायी वोटबैंक है, इसलिए उन्होंने सीमित मुस्लिम प्रतिनिधित्व रखकर अपने कोर वोटर्स और एनडीए गठबंधन की एकता दोनों को साधने की कोशिश की है।





