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Success Story: 10वीं में फेल, 18 घंटे की मजदूरी… और फिर 70 करोड़ का साम्राज्य: जाने पूरी कहानी

10वीं में फेल होने के बाद उसने 18 घंटे तक मजदूरी की। हालात इतने मुश्किल थे कि आगे बढ़ने की उम्मीद भी कम थी। लेकिन समय बदला — और आज वही शख्स 70 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर चुका है। आखिर कैसे?

Success Story: 10वीं में फेल, 18 घंटे की मजदूरी… और फिर 70 करोड़ का साम्राज्य: जाने पूरी कहानी
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Success Story: यह कहानी है एक ऐसे शख्स की, जिसने गरीबी, कर्ज और अधूरी पढ़ाई को अपनी किस्मत नहीं बनने दिया। 16 साल की उम्र में स्कूल छोड़ना पड़ा, 10वीं पास भी नहीं कर पाए। लेकिन हौसले इतने मजबूत थे कि 18 घंटे मजदूरी करने वाला यह युवक आज 70 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाली फ्लोरीकल्चर कंपनी का मालिक है।


तेलंगाना के एक छोटे से गांव से निकलकर बेंगलुरु के खेतों तक पहुंचे बोल्लापल्ली श्रीकांत आज “फ्लावर किंग” के नाम से पहचाने जाते हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय किसी डिग्री को नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और जमीनी अनुभव को देते हैं, जिसे वे मजाक में ‘स्ट्रीट-साइड एमबीए’ कहते हैं।


1,000 रुपये महीने से शुरू हुआ सफर

साल 1995 में परिवार पर चढ़े कर्ज को उतारने के लिए श्रीकांत बेंगलुरु पहुंचे। वहां एक फूलों के खेत में महज 1,000 रुपये महीने की दिहाड़ी पर काम शुरू किया।


काम के साथ-साथ उन्होंने फूल उगाने की तकनीक, मार्केटिंग और सेल्स की बारीकियां सीखीं। सिर्फ दो साल बाद, 18 साल की उम्र में उन्होंने 20,000 रुपये की छोटी पूंजी (कुछ अपनी बचत, कुछ दोस्तों से उधार) के साथ ‘ओम श्री साईं फ्लावर्स’ नाम से एक दुकान खोली।


पहले ही साल उनका टर्नओवर 5 लाख रुपये पहुंच गया। यही उनकी सफलता की पहली बड़ी सीढ़ी थी।


2005 में रखी बड़ी कंपनी की नींव

व्यापार में अनुभव के बाद श्रीकांत ने समझा कि क्वालिटी पर पूरा कंट्रोल पाने के लिए खुद की खेती जरूरी है।

साल 2005 में उन्होंने ‘वेनसाईं फ्लोरीटेक’ की स्थापना की। बेंगलुरु के पास जमीन खरीदकर हाई-टेक फार्मिंग शुरू की। आज उनके पास लगभग 70 एकड़ में फैले अत्याधुनिक फार्म हैं, जहां पॉलीहाउस तकनीक के जरिए तापमान और नमी को नियंत्रित किया जाता है।

यहां गुलाब, जरबेरा, कार्नेशन सहित 20 से अधिक किस्मों के फूल उगाए जाते हैं। उनके काम की गुणवत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक डच ब्रीडर ने उनके सम्मान में जरबेरा की एक पेटेंट किस्म का नाम उनकी बेटी के नाम पर ‘मोक्ष श्री’ रखा।


देश से विदेश तक फैला कारोबार

आज श्रीकांत की कंपनी के फूल दुबई, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में निर्यात होते हैं।

उन्होंने कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है। फूलों को तोड़ते ही 2-4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ठंडा किया जाता है, ताकि उनकी ताजगी बनी रहे।

घरेलू बाजार में उनकी कंपनी बड़े लग्जरी होटलों और हाई-प्रोफाइल शादियों में सप्लाई करती है। साथ ही सालभर डिमांड पूरी करने के लिए विदेशी किस्मों जैसे लिली और ऑर्किड का आयात भी किया जाता है।


70 करोड़ का टर्नओवर और बड़ा मिशन

आज ‘वेनसाईं फ्लोरीटेक’ का सालाना टर्नओवर 70 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। कंपनी 300 से अधिक लोगों को रोजगार दे रही है।

श्रीकांत ‘ग्रोअर्स फ्लावर काउंसिल ऑफ इंडिया’ के प्रेसिडेंट के रूप में प्लास्टिक फूलों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, क्योंकि वे पर्यावरण और किसानों की आजीविका दोनों के लिए नुकसानदायक हैं।

उनका अगला लक्ष्य अपनी पूरी खेती को सौर ऊर्जा पर शिफ्ट करना और रसायनों के उपयोग को कम करना है।


संघर्ष से सफलता तक की मिसाल

बोल्लापल्ली श्रीकांत की कहानी बाताती है संसाधनों की कमी कभी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। 10वीं में असफल होने वाला एक युवा, जिसने 18 घंटे मजदूरी की, आज करोड़ों का कारोबार खड़ा कर चुका है।

उनकी यात्रा उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो हालात को अपनी हार मान लेते हैं। मेहनत, सीखने की ललक और जोखिम उठाने का साहस नहीं करते हैं। 

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रिपोर्टर / लेखक

Tejpratap

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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