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Bihar News: जानिए बिहार के CM के बारे में यह अनसुनी कहानी, जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान; लालू ने किया था यह काम, फिर भी चुप थे नीतीश कुमार

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने से बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत। क्या इससे मंडल राजनीति के एक दौर का अंत होगा?

Bihar News: जानिए बिहार के CM के बारे में यह अनसुनी कहानी, जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान; लालू ने किया था यह काम, फिर भी चुप थे नीतीश कुमार
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Bihar News : बिहार की राजनीति में यह नया साल कई बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है। कुछ ही दिनों के भीतर तीन बड़ी राजनीतिक घटनाएं सामने आई हैं, जिनका असर लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर देखने को मिल सकता है। पहले नितिन नबीन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, उसके बाद तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की कमान अपने हाथ में ले ली और अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा की सदस्यता लेने जा रहे हैं। इन घटनाओं ने साफ संकेत दे दिया है कि बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।


नीतीश कुमार की सक्रिय राजनीति से विदाई को कई राजनीतिक विश्लेषक मंडल राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के अंत के रूप में भी देख रहे हैं। लगभग तीन दशक तक बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार ने सामाजिक समीकरणों और विकास की राजनीति के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। यही वजह रही कि वह केवल एक जाति विशेष के नेता नहीं माने गए, बल्कि लगभग सभी जातियों और वर्गों में उनकी स्वीकार्यता बनी रही।


दरअसल, 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्णिया में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने संकेत दे दिया था कि यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है। उस समय उन्होंने कहा था, “यह मेरा आखिरी चुनाव है, अंत भला तो सब भला।” हालांकि उस चुनाव में उनकी पार्टी जनता दल (यू) को 2005 के बाद सबसे कम 43 सीटें मिली थीं। इसके बावजूद गठबंधन की राजनीति के कारण नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2020 के चुनाव के बाद से ही नीतीश कुमार धीरे-धीरे अपनी पुरानी राजनीतिक पहचान से दूरी बनाने लगे थे। वे हमेशा अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर बेहद सतर्क रहे। इस मामले में उनकी शैली लालू प्रसाद यादव से बिल्कुल अलग रही। जहां लालू यादव सार्वजनिक मंचों और निजी बातचीत में बेहद अनौपचारिक रहते थे, वहीं नीतीश कुमार हमेशा संयमित और औपचारिक नजर आते थे।


समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी एक पुराने प्रसंग का जिक्र करते हुए बताते हैं कि 1994 में आयोजित कुर्मी चेतना रैली में शामिल होने को लेकर भी नीतीश कुमार असमंजस में थे। उन्हें चिंता थी कि इससे अन्य जातियों में गलत संदेश जा सकता है। हालांकि बाद में काफी समझाने के बाद वह उस कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे यह साफ होता है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक छवि और सामाजिक संतुलन को लेकर कितने सजग रहते थे।


झारखंड में जदयू के विधायक और नीतीश कुमार के पुराने सहयोगी सरयू राय भी बताते हैं कि नीतीश कुमार अपने बेहद करीबी लोगों के सामने भी बहुत सीमित ही खुलते थे। उन्होंने कई मौकों पर अपमान भी चुपचाप सह लिया, लेकिन सार्वजनिक तौर पर कभी प्रतिक्रिया नहीं दी। राय एक घटना का जिक्र करते हैं, जब 1992 में दिल्ली स्थित बिहार निवास में लालू यादव ने उनके साथ और ललन सिंह के साथ अपमानजनक व्यवहार किया था। उस समय भी नीतीश कुमार ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।


नीतीश कुमार ने राजनीति में गैर-यादव पिछड़ी जातियों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई। इस सामाजिक समीकरण को उन्हें सवर्ण जातियों का भी समर्थन मिला। इसी गठजोड़ ने उन्हें बिहार की सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


2000 के विधानसभा चुनाव में जदयू और भाजपा गठबंधन को 121 सीटें मिली थीं और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत के अभाव में उन्हें एक सप्ताह के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा। बाद में कांग्रेस के समर्थन से राबड़ी देवी फिर से मुख्यमंत्री बनीं।


आखिरकार 2005 में नीतीश कुमार को स्थायी रूप से सत्ता मिली। अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2010 के विधानसभा चुनाव में उन्हें ऐतिहासिक जीत मिली। उस चुनाव में एनडीए गठबंधन को 243 में से 206 सीटें मिलीं, जिसमें जदयू ने 115 और भाजपा ने 91 सीटें जीतीं। यह लालू यादव के लिए बड़ी हार साबित हुई।


हालांकि 2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने का फैसला किया। इसका खामियाजा उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। उस चुनाव में जदयू को केवल दो सीटों पर जीत मिली, जबकि भाजपा ने 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर 22 सीटें जीत लीं।


अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं, तो यह माना जा रहा है कि बिहार की राजनीति में एक युग का अंत और नए नेतृत्व के दौर की शुरुआत होने जा रही है। आने वाले समय में तेजस्वी यादव और भाजपा के नेतृत्व के बीच राजनीतिक मुकाबला और तेज होने की संभावना है।

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Tejpratap

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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