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Bihar News: भारत की नदियों पर ग्लोबल वार्मिंग का बुरा असर! गंगा से मिलन द्वार पर नाला का रूप लेती जा रही कोसी नदी

Bihar News: ग्लोबल वार्मिंग का असर इस बार उत्तर बिहार की जीवनरेखा कही जाने वाली कोसी नदी पर साफ़ दिख रहा है.

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Viveka Nand
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Bihar News: ग्लोबल वार्मिंग का असर इस बार उत्तर बिहार की जीवनरेखा कही जाने वाली कोसी नदी पर साफ़ दिख रहा है। नेपाल के गोसाईंथान चोटी से निकलकर बिहार के कुरसेला (कटिहार) में गंगा से मिलकर बंगाल की ओर बढ़ने वाली यह नदी इस वर्ष वैशाख की गर्मी में ही पानी के अभूतपूर्व संकट से जूझ रही है। पहली बार देखा गया है कि वैशाख महीने में कोसी की धार इतनी कमजोर हो गई है कि नदी अब नाले जैसी दिखने लगी है।


स्थानीय मछुआरों के अनुसार, नदी में भारी मात्रा में गाद जमा होने और लगातार तेज गर्मी के कारण कोसी का प्रवाह नवगछिया के मदरौनी से ही धीमा हो गया है। परिणामस्वरूप कुरसेला पुल के नीचे मुख्य धारा के बीच डेल्टा (टापू) उभरने लगे हैं। इससे न सिर्फ नावों की आवाजाही में बाधा उत्पन्न हो रही है, बल्कि मछुआरों की आजीविका भी संकट में आ गई है।


स्थानीय मछुआरे पवन सहनी, महेश मंडल आदि बताते हैं कि कोसी में जल स्तर कम होने से गंगा नदी का प्रवाह भी प्रभावित होगा, विशेष रूप से झारखंड के साहिबगंज क्षेत्र में। इससे इस बार गंगा में चलने वाले क्रूज और कार्गो जहाजों के परिचालन पर भी असर पड़ सकता है। वहीं कोसी से सटी बस्तियों में रहने वाले हजारों लोग मछली पालन और पकड़ने पर निर्भर हैं, जिनके समक्ष अब रोजगार का संकट मंडरा रहा है।


कोसी नदी का उद्गम क्षेत्र हिमालय की पर्वतमालाओं से जुड़ा है, जिसमें माउंट एवरेस्ट और कंचनजंगा जैसे शिखर आते हैं। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी में गिरावट, तापमान में वृद्धि और अनियमित मानसून के चलते कोसी जैसे हिमालयी नदियों में जल आपूर्ति अस्थिर हो रही है। कार्यपालक अभियंता मुकेश कुमार के अनुसार, "कोसी डाउन स्ट्रीम में है, और गाद जमा होने से प्रवाह में दिक्कत आ रही है। जल संसाधन विभाग को इस स्थिति से अवगत कराया जाएगा। हालांकि जुलाई-अगस्त में मानसून के समय कोसी पुनः जलमग्न हो जाएगी।"


पूर्व मुख्य अभियंता चारू मजूमदार कहते हैं, "कोसी की कुल लंबाई 730 किमी है, जिसमें से 260 किमी बिहार में बहती है। इसे बिहार का शोक भी कहा जाता है, क्योंकि इसके मार्ग परिवर्तन और बाढ़ से हर साल तबाही होती है।" कोसी नदी बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, खगड़िया, कटिहार और भागलपुर जिलों से होकर बहती है। इनमें कोसी प्रमंडल (सुपौल, मधेपुरा, सहरसा) सबसे अधिक प्रभावित होता है। इन जिलों में नदी की हालत का सीधा असर खेती, मछलीपालन और पेयजल पर हो रहा है।


क्या किया जाना चाहिए?

विशेषज्ञों की राय में, कोसी में जल प्रवाह बनाए रखने के लिए:

गाद निकालने की नियमित व्यवस्था (ड्रेज़िंग),

नेपाल के साथ ट्रांसबाउंडरी जल प्रबंधन सहयोग,

और जलवायु अनुकूल नीतियों को तत्काल अपनाना जरूरी है।

साथ ही, सरकार को कोसी के किनारे रहने वाले लोगों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर भी तलाशने चाहिए।

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रिपोर्टर / लेखक

Viveka Nand

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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