Bihar News : पटना से बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां बिहार सरकार अब उन वाणिज्यिक बैंकों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने जा रही है जो राज्य में लोन देने में आनाकानी कर रहे हैं या जानबूझकर ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं। सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि ऐसे बैंकों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उनके पास जमा सरकारी धन को भी वापस लिया जा सकता है।
राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी भी बैंक का रवैया व्यावसायिक ऋण या सरकारी योजनाओं के तहत लोन वितरण में असहयोगी पाया जाता है, तो उस बैंक को पहले चेतावनी दी जाएगी और सुधार नहीं होने पर उसे ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसे बैंकों में सरकारी योजनाओं की राशि भेजने पर भी रोक लगाने की तैयारी है।
उच्च स्तरीय समिति करेगी बैंकों के कामकाज की समीक्षा
सरकारी सूत्रों के अनुसार इसी महीने 15 से 20 अप्रैल के बीच एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी। इस समिति का गठन विकास आयुक्त की अध्यक्षता में किया गया है। समिति में ग्रामीण विकास, पशुपालन, मत्स्य पालन, उद्योग, गन्ना उद्योग, कृषि, पथ निर्माण और स्वास्थ्य विभाग सहित कई प्रमुख विभागों के अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव और सचिव शामिल हैं।
वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने इस बैठक को जल्द से जल्द आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि बैंकों द्वारा लोन स्वीकृति प्रक्रिया में अपनाए जा रहे रवैये की गहराई से समीक्षा की जाए और यह देखा जाए कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही समय पर लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं।
फरवरी में हुई थी पहली बैठक, अब दूसरी बैठक की तैयारी
जानकारी के अनुसार इस समिति का गठन जनवरी 2026 में राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक के बाद किया गया था। इसकी पहली बैठक फरवरी महीने में आयोजित की जा चुकी है, जिसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई थी। अब अगली बैठक में विभागवार योजनाओं के क्रियान्वयन की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।
इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि बैंकों ने अब तक राज्य सरकार की योजनाओं में कितना सहयोग दिया है और निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले कितनी प्रगति हुई है। सरकार का फोकस इस बात पर भी रहेगा कि बैंकों द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और हासिल उपलब्धियों में कितना अंतर है।
बिहार की विकास दर के बावजूद लोन वितरण में कमी
बिहार के विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह के अनुसार, राज्य की आर्थिक विकास दर पिछले कई वर्षों से 10 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है, लेकिन इसके बावजूद बैंकों द्वारा ऋण वितरण की गति अपेक्षाकृत धीमी है। उन्होंने बताया कि राज्य में बैंकिंग सेक्टर का विस्तार विकास दर के अनुरूप नहीं हो पाया है।
नए वित्तीय वर्ष में भी बैंकों द्वारा लोन वितरण क्षमता में केवल 5.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो कि राज्य की जरूरतों के मुकाबले काफी कम मानी जा रही है। इससे साफ होता है कि बैंक राज्य में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रहे हैं।
साख-जमा अनुपात पर भी उठे सवाल
बिहार में वर्तमान साख-जमा अनुपात (CD Ratio) 55.07 प्रतिशत है, जो सरकार के लक्ष्य से कम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक राज्य में लोन वितरण के लक्ष्य में कम से कम 15 प्रतिशत की वृद्धि नहीं होगी, तब तक साख-जमा अनुपात में बड़ा सुधार संभव नहीं है।
सरकार का मानना है कि यदि बैंक अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाएं तो राज्य में रोजगार, उद्योग और कृषि क्षेत्र में तेजी से विकास हो सकता है। इसी कारण अब सरकार बैंकों की कार्यप्रणाली की सख्त निगरानी करने की तैयारी में है और जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाए जाएंगे।






