1st Bihar Published by: First Bihar Updated Jul 08, 2026, 7:21:59 AM
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Bihar News : बिहार में उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। राज्यपाल एवं कुलाधिपति सचिवालय की मंजूरी के बाद बिहार स्टेट यूनिवर्सिटीज पीएचडी ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशंस, 2026 लागू कर दिया गया है। इसके साथ ही वर्ष 2017 की पुरानी पीएचडी नियमावली समाप्त हो गई है। नए नियम 4 जुलाई 2026 से प्रभावी माने जाएंगे और राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में इन्हीं के आधार पर पीएचडी में दाखिला होगा।
नए प्रावधानों के तहत अब चार वर्षीय शोध सहित स्नातक (ऑनर्स विद रिसर्च) करने वाले छात्र-छात्राएं बिना मास्टर डिग्री किए भी सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे। हालांकि इसके लिए निर्धारित शैक्षणिक मानदंड पूरे करना अनिवार्य होगा।
7.5 CGPA वालों को मिलेगा सीधा मौका
नई व्यवस्था के अनुसार चार वर्षीय स्नातक (ऑनर्स) पाठ्यक्रम में यदि किसी छात्र को पहले छह सेमेस्टर तक 7.5 CGPA या उससे अधिक अंक प्राप्त होते हैं, तो उसे चौथे वर्ष में शोध (Research) का विकल्प मिलेगा। ऐसे छात्र चौथे वर्ष के दौरान पीएचडी का आवश्यक कोर्सवर्क भी पूरा कर सकेंगे। यही कारण है कि उन्हें बाद में एक वर्षीय मास्टर डिग्री करने की आवश्यकता नहीं होगी और वे सीधे पीएचडी में प्रवेश के पात्र बन जाएंगे।
वहीं जिन छात्रों का सीजीपीए 7.5 से कम होगा, उन्हें केवल स्नातक (ऑनर्स) की डिग्री मिलेगी और आगे पीएचडी के लिए उन्हें निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
तीन वर्षीय ग्रेजुएशन वालों के लिए क्या नियम?
यदि किसी छात्र ने तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा किया है, तो उसे पहले दो वर्षीय स्नातकोत्तर (PG) या फिर चार वर्षीय शोध सहित स्नातक के बाद एक वर्षीय मास्टर डिग्री पूरी करनी होगी। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य होंगे, जबकि आरक्षित वर्गों को यूजीसी के नियमों के अनुसार छूट मिलेगी।
NET, CSIR-NET और GATE से होगा प्रवेश
नई नियमावली के अनुसार अब बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी में प्रवेश केवल यूजीसी-नेट (UGC-NET), यूजीसी-सीएसआईआर-नेट (CSIR-NET) या गेट (GATE) उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को ही मिलेगा। चयन प्रक्रिया में 80 प्रतिशत वेटेज नेट या गेट के अंकों को और 20 प्रतिशत वेटेज इंटरव्यू को दिया जाएगा।
पीएचडी की अवधि तीन से छह वर्ष
नियमों के मुताबिक पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और अधिकतम छह वर्ष निर्धारित की गई है। विशेष परिस्थितियों में शोधार्थियों को दो वर्ष का अतिरिक्त समय दिया जा सकेगा। वहीं महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थियों को अतिरिक्त दो वर्ष की विशेष छूट भी मिलेगी।
रिसर्च पेपर और अकादमिक सम्मेलन होंगे अनिवार्य
नई व्यवस्था के तहत पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने के लिए शोधार्थी को थीसिस जमा करने से पहले कम से कम एक शोध पत्र (Research Paper) प्रकाशित करना होगा। इसके अलावा किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन में अपना शोध प्रस्तुत करना भी अनिवार्य रहेगा।
साथ ही शोध प्रबंध (थीसिस) में 10 प्रतिशत से अधिक प्लेजरिज्म पाए जाने पर उसे संशोधन के लिए वापस भेज दिया जाएगा।
शिक्षण कार्य भी करना होगा
पीएचडी करने वाले शोधार्थियों को केवल शोध ही नहीं, बल्कि शिक्षण और अकादमिक प्रशिक्षण में भी भाग लेना होगा। उन्हें हर सप्ताह चार से छह घंटे तक ट्यूटोरियल, प्रयोगशाला कार्य या रिसर्च असिस्टेंट के रूप में योगदान देना होगा, ताकि शिक्षण और शोध दोनों का व्यावहारिक अनुभव मिल सके।
रिटायरमेंट से पहले नए शोधार्थी नहीं ले सकेंगे शिक्षक
नए नियमों में शोध निर्देशन को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष से कम समय बचा होगा, वे नए पीएचडी शोधार्थियों का पंजीकरण नहीं कर सकेंगे। हालांकि पहले से उनके निर्देशन में पंजीकृत शोधार्थियों का मार्गदर्शन वे सेवानिवृत्ति तक जारी रख सकेंगे।
छह महीने में पूरी होगी मूल्यांकन प्रक्रिया
नई विनियमावली के तहत पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन दो बाह्य परीक्षकों और शोध-निर्देशक द्वारा किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर वाइवा ऑनलाइन माध्यम से भी आयोजित किया जा सकेगा। विश्वविद्यालयों को पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य दिया गया है।
इन नए नियमों को यूजीसी 2022 के मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे बिहार में शोध की गुणवत्ता बढ़ेगी और प्रतिभाशाली छात्रों को कम समय में उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान के बेहतर अवसर मिल सकेंगे।