Bihar Politics : बिहार की राजनीति में सीधे जनता के खातों में सरकारी योजनाओं का पैसा भेजने यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) की व्यवस्था आज आम बात हो गई है। लेकिन इसकी जरूरत और मांग कैसे पैदा हुई, इसका जिक्र बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने अपनी एक पुस्तक में विस्तार से किया है। उन्होंने बताया है कि 1990 के दशक में बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार और बिचौलियों का जाल इतना गहरा था कि गरीबों तक सरकारी योजनाओं का पैसा पूरी तरह नहीं पहुंच पाता था।
सुशील मोदी के अनुसार, जब बिहार में लालू प्रसाद यादव और बाद में राबड़ी देवी की सरकार थी, उस समय केंद्र सरकार की कई योजनाओं के पैसे राज्य के माध्यम से गरीबों तक पहुंचते थे। लेकिन जमीनी स्तर पर अफसरशाही और बिचौलियों के कारण बड़ी मात्रा में धन रास्ते में ही गायब हो जाता था। यह शिकायतें उन्हें लगातार अपने आवास पर लगने वाले जनता दरबार में सुनने को मिलती थीं।
सुशील मोदी लिखते हैं कि जनता दरबार में अक्सर लोग शिकायत करते थे कि सरकार की योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन उनका लाभ सीधे जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता। कई बार अधिकारियों और स्थानीय बिचौलियों के कारण योजना का बड़ा हिस्सा कमीशन में चला जाता था। इन शिकायतों ने उन्हें इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने इस विषय को बिहार विधानसभा में भी जोरदार तरीके से उठाया था। सुशील मोदी ने सदन में कहा था कि पिछले कई वर्षों में ग्रामीण विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन उसका वास्तविक लाभ गरीबों तक नहीं पहुंच पाया। उन्होंने आरोप लगाया था कि योजनाओं की राशि का लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक हिस्सा कमीशन के रूप में लिया जा रहा है। उनका कहना था कि नीचे से ऊपर तक नौकरशाही और उन्हें संरक्षण देने वाले कुछ राजनेताओं की वजह से बिहार में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो गई थीं।
अपनी पुस्तक में उन्होंने एक और महत्वपूर्ण उदाहरण का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि उस समय केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग के सचिव एन.सी. सक्सेना ने बिहार की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य की प्रशासनिक हालत मध्य युग की याद दिलाती है। सक्सेना के अनुसार, बिहार के कई अफसरों और उगाही करने वालों में फर्क करना मुश्किल हो गया था।
सुशील मोदी ने यह भी बताया कि वर्ष 1997-98 में केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास के लिए बिहार को 117 करोड़ रुपये दिए थे। लेकिन राज्य सरकार उस राशि का पूरा उपयोग नहीं कर पाई। उस समय के मंत्री द्वारा अखबारों में 65 प्रतिशत राशि खर्च होने का बयान दिया गया था, जबकि शेष राशि साल के अंत तक भी खर्च नहीं की जा सकी। इसे लेकर भी उन्होंने विधानसभा में सवाल उठाया था।
यही वह दौर था जब पहली बार यह बहस तेज हुई कि सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के खातों में भेजा जाए, ताकि बिचौलियों और भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके। बाद के वर्षों में तकनीक और बैंकिंग प्रणाली के विस्तार के साथ यह विचार मजबूत होता गया और अंततः देश में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की व्यवस्था लागू हुई।
अगर वर्तमान बिहार की राजनीति से इसे जोड़कर देखें तो आज लगभग सभी प्रमुख योजनाओं में DBT व्यवस्था लागू है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार भी कई योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजने का दावा करती है। छात्रवृत्ति, साइकिल योजना, पोशाक योजना, किसान सम्मान निधि और सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी कई योजनाएं अब इसी प्रणाली के माध्यम से संचालित हो रही हैं।
हालांकि, आज भी बिहार की राजनीति में भ्रष्टाचार और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। विपक्ष अक्सर सरकार पर योजनाओं के लाभ में अनियमितता का आरोप लगाता है, जबकि सरकार का कहना है कि DBT व्यवस्था ने पारदर्शिता बढ़ाई है और बिचौलियों की भूमिका लगभग खत्म कर दी है।
इस तरह देखा जाए तो बिहार में सीधे खातों में पैसा भेजने की व्यवस्था सिर्फ एक प्रशासनिक सुधार नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की राजनीति और भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी आवाज का परिणाम भी थी। आज जब राज्य की राजनीति में विकास और पारदर्शिता की बात होती है, तब यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ जाता है कि कभी यही बिहार था जहां गरीबों तक सरकारी योजनाओं का पैसा पहुंचाने के लिए भी नई व्यवस्था की मांग उठानी पड़ी थी।






