Bihar Litchi: बिहार, जो कभी देश की लीची राजधानी के नाम से जाना जाता था, अब अपनी इस पहचान को खोने की कगार पर है। इस साल के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में लीची का उत्पादन लगभग आधा रह गया है। पहले बिहार देश के कुल लीची उत्पादन का 40% हिस्सा पैदा करता था, लेकिन अब पड़ोसी राज्य इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अनुसार, जहां बिहार में सालाना 3 लाख टन लीची उत्पादन का लक्ष्य था, वहीं 2024-25 में यह घटकर 1.35 लाख टन रह गया।
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लीची उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। लीची किसानों के सामने कई चुनौतियां हैं, जो इस संकट को और गहरा रही हैं। भारतीय लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह बताते हैं कि किसानों को उनकी फसल की सही कीमत नहीं मिल रही है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश ने लीची की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है।
बिहार में कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण लीची को लंबे समय तक ताजा रखना मुश्किल है। साथ ही, अन्य राज्यों तक लीची पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था भी अपर्याप्त है, जिससे किसानों का उत्साह कम हो रहा है और नए बागानों का विकास रुक गया है। यही नहीं लीची के प्रसंस्करण से जुड़ा पल्प उद्योग भी संकट में है। कुछ साल पहले बिहार में 40-50 छोटे पल्प निर्माता थे, जो अब घटकर 10 के आसपास रह गए हैं।
कोल्ड स्टोरेज की कमी इस उद्योग के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि बिना उचित भंडारण के लीची जल्दी खराब हो जाती है। इससे न केवल किसानों को नुकसान हो रहा है, बल्कि उद्योगों का भविष्य भी खतरे में है। अगर इस दिशा में समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो बिहार सबसे बड़े लीची उत्पादक राज्य का दर्जा खो सकता है।
अब इस संकट से निपटने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने की जरूरत है। कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं का विस्तार, बेहतर परिवहन व्यवस्था और किसानों को सब्सिडी व प्रशिक्षण देने से ही लीची की खेती को बढ़ावा मिल सकता है। इसके अलावा जलवायु अनुकूल तकनीकों और नई प्रजातियों पर शोध को प्रोत्साहन देना होगा।





